देश के जाने माने वकील और सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने वकालत से संन्यास लेने का फैसला किया है। यह ख़बर चौंकाने वाली है। क्योंकि एडवोकेट कभी रिटायर नहीं होते। लड़ते रहते है जीवन पर्यंत न्याय के लिए। कभी कमज़ोर के लिए, कभी सक्षम के लिए। सुप्रीम कोर्ट के जज होने के बाद ही इसपर विराम लगता है। क्योंकि एक एडवोकेट जब सुप्रीम कोर्ट का जज बनता है, जज से रिटायर होने के बाद उसके पास वकालत करने का विकल्प नहीं बचता। क्योंकि हाईकोर्ट का जज रिटायर होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर सकता है, सुप्रीम कोर्ट का जज रिटायर होने के बाद कहीं प्रेक्टिस नहीं कर सकता। ऐसे मे दवे साहब का संन्यास लेना चौकाता है।
#BREAKING Senior Advocate Dushyant Dave decided to quit legal legal profession.
He announced this decision on turning the age of 70 years. He said that he will use his time to help the society and to pursue his passions of reading and travelling. pic.twitter.com/8GrH0LC9vs
— Live Law (@LiveLawIndia) July 13, 2025
दुष्यंत दवे की प्रैक्टिस भी अच्छी चल रही थी। अभी देश को, समाज को उनकी जरूरत भी तो थी। सामाजिक न्याय के लिए, दबे कुचलों को न्याय दिलाने की आवाज़ उठाने वाले ऐसे भी बहुत कम लोग बच्चे हैं। लखीमपुर खीरी किसान कुचले जाने का मामला हो या बुल्डोजर जस्टिस के खिलाफ आवाज़ उठाने का मामला, दवे साहब ने कोर्ट में खूब लड़ा। जज लोया की मौत का मामला जब सुप्रीम कोर्ट आया, दवे साहब भी तो थे इस केस में। इसके अलावा हिजाब बैन, कृषि बिल, अयोध्या सहित तमाम बड़े और अहम मामलों में पेश होते रहे थे दवे साहब। उनके संन्यास से एक शून्य उभरा है न्यायपालिका के गलियारे में, जिसका भरना मुश्किल है।
दुष्यंत दवे की उम्र अभी मात्र 70 साल हुई है। मात्र 70 साल लिखने की वजह है। वकीलों के लिए सत्तर साल की उम्र कोई उम्र नहीं होती! सीनियर एडवोकेट राजीव धवन की उम्र, दवे से अधिक है। धवन साहब 78 साल के हैं, प्रैक्टिस जारी है। पूर्व अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल तिरानबे साल के हो चुके हैं, आज भी वकालत कर रहे हैं। बिहार में वोटर वेरिफिकेशन से जुड़े मामले में पिछले हफ्ते ही पेश हुए थे। 92 वर्ष की उम्र में के परासरन ने अयोध्या मामले में रामलला के वकील बनकर उनको जीत दिलाए थे। मशहूर वकील राम जेठमलानी अपने 90 को आयु पूरा करने के बाद अपने जीवन के आखिरी दिनों में जब सुप्रीम कोर्ट आते थे तो जजों को याद दिलाते रहते थे कि वे अपने मृत्यु का इंतज़ार कर रहे हैं, कल हों न हों, इसलिए उनके मामले को सुन लिया जाए! 95 की उम्र में अपनी मृत्यु से पहले तक जेठमलानी साहब वकालत करते रहे थे। यह तो कुछ नाम हैं, ऐसे वकीलों की लम्बी लिस्ट है जो दवे साहब से उम्र दराज हैं और उन्होंने वकालत नहीं छोड़ी है।
दुष्यंत दवे का जन्म 1954 में हुआ था और उन्होंने 1977 में अपनी वकालत की यात्रा शुरू की थी। अहमदाबाद में उन्होंने सिविल और संवैधानिक मामलों के साथ वकालत शुरू की और 1990 के दशक में दिल्ली आ गए। 1994 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीनियर एडवोकेट का दर्जा दिया गया। सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने कई महत्वपूर्ण मामलों में पक्ष रखा और साथ ही मध्यस्थता (arbitration) के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाई। दुष्यंत दवे तीन बार सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे। बार, बेंच और जनहित के मुद्दों पर उन्होंने हमेशा मुखर रूप अपनाया और जरूरत पड़ने पर बिना लाग-लपेट के आलोचना भी की। उन्होंने चार दशकों में सुप्रीम कोर्ट में कई अहम संवैधानिक और जनहित के मामलों में पैरवी की।
पांच दशक के अपने शानदार लीगल करियर से संन्यास की घोषणा करते हुए उन्होंने दुष्यंत दवे ने कहा है कि उनके इस निर्णय के पीछे कोई विशेष कारण नहीं है, बस वे युवाओं के लिए जगह छोड़ना चाहते हैं। क्या यही कारण है ? विश्वास नहीं हो रहा! लेकिन जब वो खुद ऐसा बोल रहे हैं तो मानना ही पड़ेगा। दुष्यंत दवे चाहे कोर्ट के बाहर हो या कोर्ट के भीतर, जो बोलते थे दिल से और बेझिझक बोलते थे। जब लगा प्रधानमंत्री की आलोचना कर दी, जब न्यायपालिका की कमियां दिखी, उसे भी खरीखोटी सुना दिया। एक बार सुप्रीम कोर्ट या किसी कोर्ट की आलोचना के सवाल पर दवे साहब ने कहा था कि आलोचना करना अपने देश में मौलिक अधिकार है और जज कानून के ऊपर नहीं हैं। जजों के फैसले की आलोचना जरूर हो सकती है लेकिन उन्हें निजी तौर पर क्रिटिसाइज नहीं कर सकते हैं। आप सत्य बोल रहे हैं तो कंटेम्प्ट नहीं हो सकता है।
हाल के वर्षों में देश में बढ़ रही सम्प्रदायिक वैमनस्यता से बहुत आहत थे दवे साहब। मुझे याद है एक बार करन थापर के साथ इंटरव्यू में देश के हालात पर बोलते हुए फफक फफक कर रोने लगे थे। उन्होंने भरे गले से कहा था कि “अपने देश को लेकर चिंतित हूं। मैं अपने प्रिय लोगों के लिए चिंतित हूं।.. जो हो रहा है वह वाकई दुखद है, और मुझे नहीं पता कि इस देश में कोई भी सांप्रदायिकता खिलाफ खड़ा होकर लड़ना क्यों नहीं चाहता!” उन्होंने ये भी कहा था कि “देश में डर का माहौल बन गया है। प्रधानमंत्री देश में काफी पॉपुलर हैं। उनके सामने विपक्ष का कोई ऐसा नेता है। …मैं मित्रों से कहता हूं कि पीएम और भाजपा को जरूर बधाई देना चाहता हूं कि उन्होंने लोगों से हिम्मत ले ली है, छीन ली है। आज हम सही बात नहीं कर सकते हैं। आज किसी भी ड्रॉइंग रूम में ओपन चर्चा नहीं हो सकती है। देश में पोलराइजेशन हो गया है…।”
दुष्यंत दवे की गिनती देश के बड़े वकीलों में होती है। करण थापर के साथ इंटरव्यू में संभल पर बोलते हुए फफक कर रो पड़े! pic.twitter.com/pCXtqCpJO2
— Prabhakar Kumar Mishra (@PMishra_Journo) November 30, 2024
दवे साहब ने न्यायपालिका से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया है। उन्होंने कहा कि अब वह अपना समय समाज की सेवा करने और अपने पढ़ने व यात्रा करने के शौक को पूरा करने में लगाएंगे। अब कोई भी मामला नहीं लेंगे, चाहे वह कितना भी महत्वपूर्ण क्यों न हो। .. दुष्यंत दवे की इन शब्दों में एक पीड़ा है। यह सामान्य घोषणा नहीं है। ऐसा कौन करता है दवे साहब? कोई न्याय का योद्धा इस तरह संन्यास नहीं लेता! अभी देश, समाज और न्यायपालिका को आपकी जरूरत थी।