सरकार एक नया क़ानून लेकर आ रही है जिसमें प्रावधान है कि गंभीर आरोपों (जिसमें पांच साल या अधिक की सजा हो सकती है) से जुड़े मामले में गिरफ्तारी के बाद प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और कोई मंत्री, अगर 30 दिन तक जेल में रह गए तो उनको इस्तीफा देना पड़ेगा। अब तक प्रावधान है कि दो साल या दो साल से अधिक की सजा ( भ्रष्टाचार और ड्रग ट्रैफिकिंग में केवल दोषी होना काफी ) होने के बाद ही कुर्सी जाती थी। मतलब जेल गए, तो कुर्सी भी जाएगी!
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार को लोकसभा में तीन बिल- 130वाँ संविधान संशोधन बिल, 2025, जम्मू-कश्मीर रीऑर्गेनाइज़ेशन (संशोधन) बिल, 2025 और द गवर्नमेंट ऑफ़ यूनियन टेरिटरीज़ (संशोधन) बिल 2025 पेश किया। इसमें प्रस्ताव है कि यदि किसी मौजूदा मंत्री, मुख्यमंत्री या यहां तक कि प्रधानमंत्री को पांच साल या उससे अधिक की जेल की सजा वाले अपराध के लिए लगातार 30 दिनों तक गिरफ्तार या हिरासत में रखा जाता है तो उन्हें एक महीने के भीतर अपना पद गंवाना पड़ सकता है। लेकिन इस विधेयक में यह भी प्रावधान रखा गया है कि जेल से छूटने के बाद दोबारा उसी कुर्सी पर बैठा जा सकता है।
संसद की आज की तस्वीर, जब वह बिल पेश हो रहा था जिसमें प्रावधान है कि गंभीर आरोपों से जुड़े मामले में गिरफ्तारी के बाद प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और कोई मंत्री, अगर 30 दिन तक जेल में रह गए तो उनको इस्तीफा देना पड़ेगा! pic.twitter.com/WKEfP6R7hO
— Prabhakar Kumar Mishra (@PMishra_Journo) August 20, 2025
मॉनसून सत्र के ख़त्म होने के दो दिन पहले सरकार द्वारा इस बिल को संसद में पेश होने पर पूरा विपक्ष अचंभे में है। क्योंकि सरकार ऐसा कोई क़ानून बनाने वाली है, हाल के दिनों में इसपर कोई चर्चा ही नहीं हुई थी। हालांकि इस बिल को लाने की अपनी पृष्ठभूमि है। यह बिल तमिलनाडु की डीएमके सरकार में मंत्री रहे वी सेंथिल बालाजी की गिरफ़्तारी के बाद उपजे विवाद के बाद लाया गया है। मनी लॉन्डरिंग केस में बालाजी की गिरफ़्तारी के बाद तमिलनाडु के राज्यपाल आर एन रवि ने उन्हें पद से हटा दिया था। सुप्रीम कोर्ट से बालाजी को जमानत मिलने के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने उन्हें फिर से मंत्री बना दिया था। बालाजी को फिर से मंत्री बनाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई थी। इसके बाद उन्हें फेरबदल में हटा दिया गया था। इससे पहले शराब घोटाले में गिरफ्तार दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 6 महीने तक जेल में रहते हुए सरकार चलाई थी। उस दौरान इस बात पर खूब बहस हुई थी कि जेल में रहते हुए कोई मंत्री या मुख्यमंत्री कैसे रह सकता है! मामला कोर्ट में भी गया था, लेकिन क़ानून के अभाव में केजरीवाल जेल से सरकार चलाते रहे थे।
लोकसभा में गृहमंत्री अमित शाह द्वारा इन विधेयकों को पेश करने के बाद सदन में जोरदार हंगामा शुरू हो गया।जारी हंगामे के बीच कांग्रेस पार्टी ने सरकार के इन तीनों विधेयक का विरोध किया। कांग्रेस ने कहा कि सरकार को चाहिए कि वह इस बिल को वापस ले। केसी वेणुगोपाल ने कहा कि हम इस बिल का विरोध करते हैं। ये बिल देश के संविधान के खिलाफ है। उन्होंने आरोप लगाया कि ये बिल विपक्ष दलों की सरकार (राज्य सरकार) को निशाना बनाने के लिए लाया जा रहा है। ये बिल नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू जैसे लोगों को डराने के लिए लाया जा रहा है।
बिल के विरोध की वजह
विपक्षी पार्टियों को लगता है कि यह क़ानून विपक्षी पार्टी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को डराने के लिए लाया गया है। बिल के प्रावधान के मुताबिक किसी मंत्री या मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी के बाद तीस दिन तक जेल में रहते ही कुर्सी चली जाएगी। विपक्षी पार्टियां के डर की वजह है। भ्रष्टाचार के मामले में ED या CBI अगर किसी को गिरफ्तार करती है तो मौजूदा व्यवस्था के तहत 30 दिन के भीतर जमानत मिलना लगभग नामुमकिन है। मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों के मामले में निचली अदालतें अक्सर जमानत नहीं देती हैं। जमानत कम से कम हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से ही मिलता है। ऐसे में मंत्री या मुख्यमंत्री की कुर्सी जाना तय होगा। और एक बार कुर्सी चली गई तो भले ही प्रावधान है कि दोबारा कुर्सी मिल सकती है, लेकिन मुख्यमंत्री के जेल जाने के बाद सियासत वैसे ही रहेगी, राजनीतिक गुणा गणित अनुकूल ही रहेगा, ऐसा कोई जरूरी नहीं। इस प्रावधान से केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के द्वारा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को चिंता नहीं होगी क्योंकि केंद्रीय एजेंसियां अमूमन उनको गिरफ्तार नहीं करतीं हैं।
इस बिल में प्रधानमंत्री के बारे में भी व्यवस्था दी गई है कि अगर प्रधानमंत्री भी गिरफ्तार होते हैं और 30 दिन जेल में रहते हैं तो 31वें दिन उनको प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़नी होगी। लेकिन तकनीकी बात तो ये है कि केंद्रीय एजेंसियां प्रधामनंत्री को गिरफ्तार करेंगी, ऐसा करीब करीब नामुमकिन होगा।
फिलहाल इस विधेयक को विचार के लिए संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया गया है। समिति इसके प्रावधानों, उसकी कमियों आदि पर विस्तार से चर्चा करेगी।