सुप्रीम कोर्ट ने सलवा जुडूम को असंवैधानिक ठहराया था
विपक्ष के द्वारा समर्थित उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एस सुदर्शन रेड्डी ने गृहमंत्री अमित शाह द्वारा उनपर नक्सल समर्थक होने के आरोप पर जवाब देते हुए कहा कि गृहमंत्री ने सलवा जुडूम मामले में यदि 40 पन्नों का सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला पढ़ा होता, तो शायद वह ऐसा बयान नहीं देते।
अमित शाह ने अपने बयान में कहा था कि जस्टिस एस सुदर्शन रेड्डी नक्सलवाद के समर्थक रहे हैं। उन्होंने 2011 के अपने फैसले में यदि सलवा जुडूम को असंवैधानिक नहीं घोषित किया होता तो … 2020 तक देश से नक्सलवाद का खात्मा हो गया होता! उन्होंने अपने बयान में यह भी कहा था कि यही सज्जन हैं, जिन्होंने विचारधारा से प्रेरित होकर सलवा जूडुम का जजमेंट दिया था। .. केरल ने नक्सलवाद का दंश झेला है। केरल की जनता निश्चित रूप से देखेगी कि कांग्रेस पार्टी, वामपंथी दलों के दबाव में एक ऐसे उम्मीदवार को मैदान में उतार रही है जिसने नक्सलवाद का समर्थन किया और सुप्रीम कोर्ट जैसे पवित्र मंच का इस्तेमाल किया।
जस्टिस सुदर्शन रेड्डी ने अमित शाह के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह सलवा जुडूम वाला फैसला उनका निजी फैसला नहीं था, यह सुप्रीम कोर्ट का सामूहिक फैसला था। उन्होंने कहा कि गृहमंत्री ने वह यदि 40 पन्नों का वह फैसला पढ़ा होता, तो शायद वह ऐसा बयान नहीं देते। कोर्ट ने अपने इस फैसले में कहा था :
“राज्य के पास ही हिंसा के प्रयोग का विशेषाधिकार है… केवल राज्य ही इस शक्ति का प्रयोग कर सकता है। इसे किसी लक्षित समूह के ख़िलाफ़ किसी और माध्यम के ज़रिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता… राज्य अपनी शक्ति को आउटसोर्स नहीं कर सकता।” – सुप्रीम कोर्ट।
क्या था सलवा जुडूम वाला मामला
छत्तीसगढ़ सरकार ने 2005 में राज्य में नक्सलवाद की समस्या से निपटने के लिए ‘सलवा जुडूम’ अभियान की शुरुआत की थी। ‘सलवा जुडूम’ शब्द का गौंड भाषा में अर्थ है ‘शान्ति यात्रा’। ये आंदोलन छत्तीसगढ़ की तत्कालीन कांग्रेस सरकार के समर्थन से चलाया गया था। इसका उद्देश्य राज्य में नक्सली हिंसा को रोककर शांति स्थापित करना था। राज्य सरकार ने इस आंदोलन से जुड़ने वाले ग्रामीणों को नक्सलियों से लड़ने के लिए हथियारों और रसद के साथ-साथ अन्य आवश्यक चीजें भी मुहैया कराई थी। बड़ी संख्या में आदिवासी इस अभियान से जुड़ गए थे, जिन्हें छत्तीसगढ़ राज्य पुलिस ने विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) के रूप में नियुक्त किया, जो मूलतः नक्सलवाद से निपटने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक मिलिशिया बल था। शुरुआत में सलवा जुडूम आंदोलन से जुड़े आदिवासियों के पास कुल्हाड़ी टांगिया और तीर-धनुष जैसे पारंपारिक हथियार थे, लेकिन बाद में उन्हें आधुनिक हथियार दिए जाने लगे। इसके बाद नक्सलियों और आदिवासियों में हिंसा की घटनाएं बढ़ने लगी।
फरवरी 2011 में, सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों को इस तरह हथियार देना अवैध घोषित कर दिया और सलवा जुडूम को असंवैधानिक करार दिया था। वह फैसला जस्टिस बी सुदर्शन रेड्डी और जस्टिस एस एस निज्जर की बेंच ने ही सुनाया था। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि ” सलवा जुडूम का गठन राज्य की संवैधानिक ज़िम्मेदारियों से पलायन था। यह राज्य की ज़िम्मेदारी थी कि नागरिकों को उपयुक्त सुरक्षा प्रदान की जाए। इसके लिए पर्याप्त संख्या में, प्रशिक्षित, पेशेवर और स्थायी रूप से सुसज्जित पुलिस बल होना चाहिए। कोर्ट ने अपने फैसले में आगे लिखा था कि “राज्य के पास ही हिंसा के प्रयोग का विशेषाधिकार है… केवल राज्य ही इस शक्ति का प्रयोग कर सकता है। इसे किसी लक्षित समूह के ख़िलाफ़ किसी और माध्यम के ज़रिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता… राज्य अपनी शक्ति को आउटसोर्स नहीं कर सकता।” जस्टिस सुदर्शन रेड्डी ने इसी फैसले के बारे में कहा है कि गृहमंत्री अमित शाह ने 40 पन्नों के इस फैसले को पढ़ा होता तो ये बयान नहीं दिए होते कि मैंने वामपंथी उग्रवाद को मदद करने के लिए सलवा जुडूम का जजमेंट दिया था।
जस्टिस एस सुदर्शन रेड्डी को इंडिया गठबंधन ने उपराष्ट्रपति चुनाव में अपना उम्मीदवार बनाया है। उनका मुकाबला एनडीए गठबंधन के राष्ट्रपति उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन से है।
1 thought on “सलवा जुडूम मामले में सुप्रीम कोर्ट का वो फैसला जिसे लेकर उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार पर लगा नक्सल समर्थक होने का आरोप !”