केंद्र सरकार जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर चुकी थी। 21 जुलाई से शुरू हो रहे मॉनसून सत्र में महाभियोग प्रस्ताव पास हो जाए, इसके लिए सरकार ने आम सहमति बनाने के लिए विपक्षी पार्टियों को मनाने की कवायद तेज कर दी थी। लेकिन विपक्ष ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ महाभियोग की मांग उठाकर सरकार को असहज कर दिया है। ऐसे में जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ़ महाभियोग पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया में छपे गृहमंत्री अमित शाह के इंटरव्यू में सवाल पूछा गया था कि जस्टिस यशवंत वर्मा को जज की कुर्सी से हटाने को लेकर सरकार जितना उत्सुक है, क्या जस्टिस शेखर यादव के मामले में भी सरकार उतनी ही उत्सुक होगी? गृहमंत्री न अपने जवाब में कहा था कि यशवंत वर्मा का मामला भ्रष्टाचार से जुड़ा है! जस्टिस शेखर यादव का मामला जज के आचरण ( conduct of a judge) से जुड़ा है! दोनों में अंतर है। एक भ्रष्टाचार का मामला है दूसरा अनुचित आचरण का, और दोनों बिल्कुल अलग है। जज के अनुचित आचरण के मामले में सुप्रीम कोर्ट को फैसला करना होता है, इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं है।
जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास पर 14 मार्च को आग लगने के समय नकदी का भंडार मिला था। उस समय जस्टिस वर्मा अपने आवास पर नहीं थे। मामले की सूचना चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को दिए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया था। सीजेआई ने तीन सदस्यीय इन हाउस इंक्वायरी कमेटी का गठन किया। कमेटी ने जस्टिस यशवंत वर्मा प्रतिकूल रिपोर्ट दी थी। जस्टिस वर्मा को इस्तीफा देने की सलाह दी गई थी। लेकिन जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने ऊपर लगे आरोपों को ख़ारिज करते हुए इस्तीफा देने से इंकार कर दिया था। उसके बाद तत्कालीन सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना ने सरकार से लिखकर जस्टिस यशवंत वर्मा को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू करने की मांग की थी।
प्रयागराज में 8 दिसंबर 2024 को विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस शेखर यादव के भाषण ने न केवल सामाजिक और राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों को लेकर गहरा सवाल भी खड़ा कर दिया था।
अपने भाषण में जस्टिस यादव ने कहा था कि ‘भारत को बहुसंख्यकों की इच्छानुसार चलना चाहिए’ और दावा किया कि ‘केवल एक हिंदू ही भारत को विश्वगुरु बना सकता है!’ उन्होंने मुस्लिम समुदाय की प्रथाओं जैसे ट्रिपल तलाक और हलाला की आलोचना करते हुए यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) की वकालत की थी।
राज्यसभा सचिवालय ने सुप्रीम कोर्ट को चिट्ठी लिखकर जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ़ जांच रुकवा दी थी! उपराष्ट्रपति को शिकायत है कि जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले में न्यायपालिका ने समय रहते कार्रवाई नहीं की!
मुस्लिमों को ‘कठमुल्ला’ कहने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस शेखर यादव के… pic.twitter.com/NpAizQQ6is
— Prabhakar Kumar Mishra (@PMishra_Journo) June 9, 2025
जब यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो आलोचनाओं की बाढ़ आ गई। राजनीतिक दलों, वरिष्ठ वकीलों, नागरिक संगठनों और यहां तक कि पूर्व न्यायाधीशों ने इस बयान को न्यायिक गरिमा और धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ बताया। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल के नेतृत्व में 55 विपक्षी सांसदों ने राज्यसभा में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव भी दायर किया था, जो फिलहाल लंबित है।
जजों को पद से हटाने की प्रक्रिया
मामला चाहे भ्रष्टाचार का हो या जज के अनुचित आचरण का, संविधान दोनों में कोई भेद नहीं करता। दोनों स्थितियों में जज को हटाने की प्रक्रिया और कार्यवाही एक है। संविधान के अनुच्छेद 124(4) में जजों को पद से हटाने की व्यवस्था दी गई है। जिसमें कहा गया है कि जजों को सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर पद से हटाया जा सकता है। दोनों स्थिति में एक ही प्रक्रिया निर्धारित है। प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है। अगर राज्यसभा में आता है तो 50 सांसदों के हस्ताक्षर चाहिए होता है और अगर प्रस्ताव लोकसभा में आता है तो 100 सांसदों। अगर प्रस्ताव दोनों सदनों से विशेष बहुमत से पास हो जाता है तो राष्ट्रपति पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं!
इस बीच एक और प्रक्रिया अपनाई जाती है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस चाहें तो पहले इन- हाउस इंक्वायरी कराकर आरोप जांच करते हैं। उन्हें आरोप सही लगता है तो सरकार को लिखते हैं कि आरोपी जज को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले में यही प्रक्रिया अपनाई गई है। संसद में अभी महाभियोग प्रस्ताव आया नहीं है। लाने की कवायद चल रही है।
जस्टिस शेखर यादव के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कोई जांच नहीं की! क्योंकि जब CJI जांच के लिए इन हाउस कमेटी का गठन करने वाले थे तब राज्य सभा सचिवालय से सुप्रीम कोर्ट को एक चिट्ठी गई जिसमें संदेश था कि इस मामले में जांच करने का अधिकार केवल राज्यसभा का है। राज्यसभा की ओर से भेजे गए पत्र में कहा गया था कि ऐसी किसी भी कार्यवाही के लिए संवैधानिक अधिकार पूरी तरह से राज्यसभा के सभापति के पास है ( क्योंकि जस्टिस शेखर यादव को हटाने प्रस्ताव पर राज्यसभा के 55 सांसदों ने हस्ताक्षर करके सभापति को भेज दिया था। ) इसलिए संसद और राष्ट्रपति ही इस पर निर्णय लेंगे। इस पत्र के बाद सीजेआई ने जांच की योजना को वहीं रोक दिया और मामला ख़त्म हो गया! .. जस्टिस यादव के खिलाफ उनको पद से हटाने के लिए राज्यसभा के 55 सांसदों के हस्ताक्षर वाला प्रस्ताव भी राज्यसभा के सभापति के पास गया था। उसमें भी कुछ नहीं हुआ। कांग्रेस सहित विपक्ष की मांग है कि उस प्रस्ताव पर कार्रवाई हो!
जस्टिस शेखर यादव के मामले में सरकार मौन है, विपक्ष महाभियोग की मांग कर रहा है! जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले में सरकार महाभियोग प्रस्ताव लाने वाली है, लेकिन विपक्ष इसके खिलाफ लामबंद हो रहा है!
यही राजनीति है! और राजनीति केवल अपना हित देखती है! pic.twitter.com/5T1G7NKdIz
— Prabhakar Kumar Mishra (@PMishra_Journo) June 18, 2025
संसद में जब जज को हटाने का प्रस्ताव आता है, प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद एक जांच कमेटी गठन किए जाने का प्रावधान है। जिसमें सुप्रीम कोर्ट के एक जज, हाईकोर्ट के एक जज और एक न्यायविद शामिल होंगे, जो आरोपों की जांच करेंगे! जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले में अभी प्रस्ताव आया नहीं है। सरकार, CJI के द्वारा गठित इन हाउस कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई चाहती है विपक्ष इसका विरोध कर रहा है। साथ ही विपक्ष की तरफ से जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ महाभियोग की मांग अब तेज हो गई है, जिसके लिए सरकार तैयार नहीं दिख रही है! ऐसे में जस्टिस यशवंत वर्मा को उनके पड़ से हटाने के प्रस्ताव पर विपक्ष का समर्थन मिलने की संभावना कम दिखाई दे रही है!