सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट में होने वाली नियुक्तियों और पदोन्नति में एससी/एसटी के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू हुई है। सुप्रीम कोर्ट में काम करने वाले रजिस्ट्रार, सीनियर पर्सनल असिस्टेंट, असिस्टेंट लाइब्रेरियन, जूनियर कोर्ट स्टाफ और चैंबर अटेंडेंट जैसे पदों पर आरक्षण की यह व्यवस्था लागू होगी। यह बात ध्यान रहे कि जजों की नियुक्ति में आरक्षण की ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। वैसे सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज की नियुक्ति में हर वर्ग और हर क्षेत्र के प्रतिनिधित्व का ध्यान रखा जाता है।
सुप्रीम कोर्ट में विभिन्न पदों पर होने वाली नियुक्तियों के लिए एससी समुदाय के लोगों के लिए 15 फीसदी और एसटी वर्ग के लोगों के लिए 7.5 फीसदी आरक्षण के रोस्टर को लागू किया गया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी 54 पन्नों के इस रोस्टर प्रणाली में बताया गया है कि किस पद पर एससी और एसटी समुदाय के कितने पद आरक्षित किए जाएंगे।
सुप्रीम कोर्ट में 23 जून 2025 से प्रभावी होने वाले इस कदम को शीर्ष न्यायपालिका के आंतरिक प्रशासन में एक ऐतिहासिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट में अधिकारियों और कर्मचारियों की सीधी नियुक्ति में एससी और एसटी समुदाय के लिए औपचारिक तौर पर आरक्षण देने का यह महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बीआर गवई के कार्यकाल में हुआ है, जो स्वयं अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं। सीजेआई गवई देश के सर्वोच्च न्यायिक पद पर पहुंचने वाले एससी समुदाय से दूसरे व्यक्ति हैं। जस्टिस के जी बालाकृष्णन पहले CJI थे जो अनुसूचित जाति से आते थे। देश की सबसे बड़ी अदालत में अनुसूचित जनजाति समुदाय का जज आजतक नहीं पहुंचा है।
देश में संविधान लागू होने के बाद से ही सभी सरकारी संस्थाओं, प्रतिष्ठानों में आरक्षण की व्यवस्था लागू है। लेकिन अपने फैसलों और न्यायिक समीक्षा के जरिए देश में सामाजिक न्याय स्थापित करने में सबसे आगे रहने वाली संस्था, सुप्रीम कोर्ट में आरक्षण की व्यवस्था आजतक लागू नहीं थी। जबकि कुछ हाइकोर्ट्स में लागू है। सुप्रीम कोर्ट में हुए इस ऐतिहासिक बदलाव के लिए जस्टिस बी आर गवई को हमेशा याद किया जाएगा।