भारत के संविधान की प्रस्तावना
संविधान की प्रस्तावना में आपातकाल के दौरान जोड़े गए ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों को लेकर समय समय पर बहस होती रही है। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने जब प्रस्तावना में जोड़े गए इन शब्दों को उचित ठहराया तो लगा था कि अब विराम थम जायेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने प्रस्तावना में जोड़े गए इन शब्दों को नासूर बताकर एक बार फिर बहस छेड़ दिया है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि ‘संविधान की प्रस्तावना परिवर्तनशील नहीं है। फिर भी आपातकाल में इसे बदल दिया गया और यह संविधान बनाने वालों की बुद्धिमत्ता के साथ विश्वासघात का संकेत है। आपातकाल के दौरान प्रस्तावना में जो शब्द जोड़े गए वे नासूर थे।’
We are changing the soul of the Constitution by this flash of words, added during the period of Emergency — the darkest period for the Constitution of the country.
These words have been added as नासूर. These words will create upheaval. Addition of these words in the Preamble… pic.twitter.com/cg2cmzN0r7
— Vice-President of India (@VPIndia) June 28, 2025
सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्तावना में जोड़े गए ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ को सही ठहराया था।
प्रस्तावना में बदलाव के 44 साल बाद, 2020 में इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट डॉ बलराम सिंह ने ‘समाजवादी’ और ‘पंथ-निरपेक्ष’ शब्द को प्रस्तावना में शामिल करने को चुनौती दी। बीजेपी सांसद और पूर्व विधि मंत्री सुब्रह्मण्यम स्वामी, एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय और एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने भी इसे लेकर याचिका दायर की। याचिकार्ताओं की दलील थी कि ‘चूंकि यह संविधान संशोधन इमरजेंसी के दौरान हुआ था, इसलिए लोगों को इस मामले में पक्ष रखने का मौका नहीं मिला। प्रस्तावना में संशोधन का अधिकार सिर्फ संविधान सभा को था।’ यह भी दलील दी गई कि ‘पंथ-निरपेक्ष’ शब्द को संविधान के निर्माताओं ने जानबूझकर बाहर रखा था और ‘समाजवादी’ शब्द आर्थिक नीतियों को तय करने में सरकार के हाथ बांधता है। लेकिन 25 नवंबर 2024 को तत्कालीन सीजेआई संजीव खन्ना की अगुआई वाली बेंच ने इन दलीलों को ख़ारिज करते हुए प्रस्तावना में हुए बदलाव को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि ‘संसद को संविधान में संशोधन का अधिकार है और प्रस्तावना में भी। प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है, इसे संविधान से अलग नहीं माना जा सकता है।’ कोर्ट के मुताबिक, यह नहीं कहा सकता कि इमरजेंसी के दौरान संसद ने जो किया, वह अमान्य था।
“संसद को संविधान में संशोधन का अधिकार है और प्रस्तावना में भी। प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है, इसे संविधान से अलग नहीं माना जा सकता है।”
– सुप्रीम कोर्ट
जस्टिस जस्टिस खन्ना ने फैसले में लिखा था कि समाजवादी (सोशलिस्ट) और पंथनिरपेक्ष (सेकुलर) शब्द संविधान के उद्देश्यों के अनुरूप हैं। भारतीय संदर्भ में सोशलिस्ट शब्द का अर्थ वेलफेयर स्टेट यानी कल्याणकारी राज्य है। यानी भारत में समाजवाद का मतलब यह है कि राज्य (सरकार) लोगों का कल्याण सुनिश्चित करने और उन्हें समान अवसर प्रदान करने के लिए उत्तरदायी होगा। कोर्ट ने इसे इन शब्दों को संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा माना।
गौरतलब है कि एसआर बोम्मई बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में 1994 के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ कह चुकी है कि संविधान की प्रस्तावना बेसिक स्ट्रक्चर का पार्ट है। और केशवानंद भारती केस में 1973 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसद को संविधान संशोधन का अधिकार है लेकिन वह संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर के साथ छेड़छाड़ नहीं कर सकती है।
प्रस्तावना में बदलाव की पृष्ठभूमि
संविधान की मूल प्रस्तावना में ‘सेक्युलर’ शब्द नहीं था। इसमें ‘पंथनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्द जोड़ने के लिए संविधान सभा में संशोधन प्रस्ताव पेश किया गया था लेकिन उस संशोधन प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया। इसी रूप में संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू कर दिया गया। बाद में इंदिरा गांधी के शासनकाल में आपातकाल के दौरान 42वें संशोधन के जरिये संविधान की प्रस्तावना में ये दोनों शब्द जोड़ दिए गए।
संविधान सभा की बहस
संविधान सभा के कई सदस्य चाहते थे कि ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द को प्रस्तावना में शामिल किया जाए, ताकि यह तय हो सके कि भारत का राज्य किसी एक धर्म को मान्यता नहीं देगा। संविधान सभा एक सदस्य केटी शाह ने प्रस्तावना में ‘सेक्युलर स्टेट’ शब्द जोड़ने का संशोधन प्रस्तुत किया था। उनका तर्क था कि एक धार्मिक विविधता वाले देश में राज्य का धर्म से स्पष्ट दूरी बनाए रखना अनिवार्य है। लेकिन डॉ. बीआर अंबेडकर ने उस प्रस्ताव को यह कहकर इसका विरोध किया कि यह स्पष्ट करने की ज़रूरत नहीं है कि राज्य पंथनिरपेक्ष होगा या नहीं। यह संविधान की अन्य धाराओं (जैसे अनुच्छेद 25-28) से स्वतः स्पष्ट है। उनका मत था कि अगर हम हर सिद्धांत को प्रस्तावना में जोड़ते जाएंगे, तो प्रस्तावना का स्वरूप असंतुलित हो जाएगा।
इसी प्रकार बहस समाजवादी (सोशलिस्ट) शब्द को लेकर भी हुई थी। के.टी. शाह ने यह भी प्रस्ताव दिया कि भारत को एक सोशलिस्ट रिपब्लिक घोषित किया जाए। उनका तर्क था कि समाज में आर्थिक विषमता और शोषण को समाप्त करने के लिए संविधान में समाजवादी विचारधारा का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। डॉ. अंबेडकर और अन्य कई सदस्यों ने इसका विरोध किया। उनका तर्क था कि भारत के संविधान को इस रूप में बनाना चाहिए कि यह सभी विचारधाराओं को स्थान दे सके। यदि भविष्य में जनादेश समाजवाद के पक्ष में होगा, तो वह लोकतांत्रिक तरीके से लागू किया जा सकेगा। डॉ अंबेडकर का मत था कि “संविधान एक ऐसा उपकरण होना चाहिए जो समय, परिस्थिति और जनमत के अनुसार ढल सके। इसे किसी एक विचारधारा से बांधना उचित नहीं होगा।” और इस प्रकट संविधान सभा ने समाजवादी और पंथनिरपेक्ष को प्रस्तावना में शामिल करने के विचार को खारिज कर दिया था।
“संविधान एक ऐसा उपकरण होना चाहिए जो समय, परिस्थिति और जनमत के अनुसार ढल सके। इसे किसी एक विचारधारा से बांधना उचित नहीं होगा।”
– डॉ बी आर अंबेडकर
25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू किया। इस दौरान सरकार ने कई संवैधानिक संशोधन किए, जिनमें सबसे व्यापक था 42वां संविधान संशोधन, जिसे ‘मिनी संविधान’ भी कहा जाता है। यह संशोधन 1976 में पारित हुआ और इसके द्वारा प्रस्तावना में तीन प्रमुख शब्द जोड़े गए: समाजवादी (Socialist), पंथनिरपेक्ष (Secular), एकता और अखंडता (Unity and Integrity)। इस संशोधन के बाद संविधान की प्रस्तावना में भारत को “समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य” घोषित किया गया।
यह RSS के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले हैं
इन्होंने संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने की मांग की है
RSS और BJP किसी भी कीमत पर संविधान को बदलना क्यों चाहते हैं? pic.twitter.com/eMFV6npQPD
— Supriya Shrinate (@SupriyaShrinate) June 27, 2025
उपराष्ट्रपति ने ही नहीं, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने भी प्रस्तावना में जोड़े गए इन शब्दों को लेकर पुनर्विचार करने की जरूरत बताई है। मतलब यह मामला थमने वाला नहीं है। इस पर चर्चा भी होगी और सियासत भी। क्योंकि कई बार अदालत जिन मामलों पर विराम लगाने की कोशिश करती है सियासत उसे मुकाम तक पहुंचाने की कोशिश करती है।