सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ( फोटो: प्रभाकर मिश्रा )
ऐसा पहले नहीं होता होगा! लेकिन आजकल होने लगा है। सोशल मीडिया के आने के बाद आजकल प्रत्येक महत्वपूर्ण मामलों में सुप्रीम कोर्ट को एक अलग तरह की परीक्षा से गुजरना होता है। एक तो आजकल मीडिया में सुप्रीम कोर्ट की रिपोर्टिंग का तरीक़ा बदल गया है। कुछ वेबसाइट्स केवल सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही रिपोर्ट करने लगी हैं। जिसमें कोर्ट की हर छोटी बड़ी बातें लोगों तक पहुंचने लगी हैं। और दूसरा, महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों की सुनवाई की लाइव स्ट्रीमिंग होने लगी है। हालांकि न्यायपालिका में इस तरह की पारदर्शिता लोगों को पसंद भी आ रही है। लेकिन इस ‘ एक्सेसिव एक्सपोजर’ की वजह से सुप्रीम कोर्ट आजकल पूरी तरह नग्न अवस्था में दिखने लगा है। न्यायपालिक के लिए इसे बहुत अच्छा नहीं माना जा सकता। कहते भी हैं कि ‘ अति सर्वत्र वर्जयेत’। जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ जब देश के मुख्य न्यायाधीश बने थे ‘पारदर्शिता’ कुछ ज्यादा ही बढ़ गई। उन्होंने न्याय की देवी की आँखों से पट्टी हटाई, लोगों ने मानो न्यायपालिका के प्रति लिहाज हटा दिया।
बहुत पुरानी बात नहीं है। आज से कुछ साल पहले तक फैसला सुप्रीम कोर्ट का होता था, टिप्पणी भी सुप्रीम कोर्ट की होती थी। मीडिया इसी तरह रिपोर्ट करती थी। लेकिन सोशल मीडिया के दौर में, आजकल फैसला और टिप्पणी जजों के नाम से रिपोर्ट होती है। इसका असर ये हुआ है कि लोग भी यह अनुमान लगाने लगे हैं कि अमूक मामले पर फलां जज की बेंच सुनवाई करने वाली है तो फैसला क्या होगा! इस स्थिति को बेहतर तो नहीं कहा जा सकत। क्योंकि अदालतों को न्याय का मंदिर कहा जाता है और जज को न्याय का देवता ‘लॉर्ड’ माना जाता है।
सुनवाई से पहले सोशल मीडिया पर इस तरह की खबरें आने लगती हैं कि आज क्या फैसला आ सकता है! फैसले के पहले जजों को लेकर तरह तरह की टिप्पणी होने लगती है। जजों तक वो बातें नहीं पहुंचे ऐसा तो हो नहीं सकता। एक बार तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ से मैंने सोशल मीडिया पर उनके अकाउंट के बारे में पूछा था तो उन्होंने बताया था कि वो खुद सोशल मीडिया पर तो नहीं हैं, लेकिन उनके स्टाफ उन्हें बताते हैं कि सोशल मीडिया पर सुप्रीम कोर्ट और जजों के बारे में लोग क्या लिखते हैं! तो जजों पर इसका असर भी तो पड़ता होगा। हालांकि जज लोग कहते हैं कि उनपर इसका असर नहीं पड़ता है कि उनके बारे में कौन क्या बोल रहा है। लेकिन यह मान लेना ठीक वैसे ही होगा जैसे न्यायाधीश किसी दूसरे ग्रह से आते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की आज की स्थिति के लिए किसी एक कारक को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। एक तो इसके लिए खुद कोर्ट ही जिम्मेदार है! जब सुप्रीम कोर्ट के जज खुद ही एक दूसरे पर आरोप लगाने लगे तो दूसरे कैसे चुप रहते। सुप्रीम कोर्ट के चार जजों की ऐतिहासिक प्रेस कांफ्रेंस ने न्यायपालिका को बेपर्दा कर दिया था। न्यायपालिक के जिन मसलों पर लोग दबी जुबान में बात करते थे, अब इनपर चर्चा सरेआम होने लगी। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की एक जज जस्टिस बेला त्रिवेदी जब रिटायर हुईं, वकीलों ने उन्हें फरेवेल नहीं दिया था। जस्टिस बेला त्रिवेदी के बारे में सोशल मीडिया पर तरह तरह की टिप्पणियां की जानें लगीं। जस्टिस बेला त्रिवेदी खिलाफ सोशल मीडिया पर एक पत्रकार की टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना का नोटिस जारी करना पड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना हो सकती है। खुद सुप्रीम कोर्ट ये स्पष्ट कर चुका है। लेकिन आजकल कोर्ट के फैसले को लेकर जजों के खिलाफ टिप्पणियाँ की जाने लगी हैं। बीजेपी के एक सांसद ने पूर्व सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना को देश में गृहयुद्ध के लिए जिम्मेदार ठहराया था। बहुत हो हल्ला मचा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की। यह स्थिति अच्छी नहीं है। लोकतंत्र अच्छे से काम करे, इसके लिए न्यायपालिका को केवल स्वतंत्र होना ही नहीं चाहिए, न्यायपालिका बिना किसी दवाब के, बिना पक्षपात के काम करती है, ऐसा दिखना भी चाहिए।