सुप्रीम कोर्ट में योगेंद्र यादव की याचिका
बिहार में वोटर लिस्ट के वेरिफिकेशन (Special Intensive Revision- SIR) को चुनाव विश्लेषक और राजनेता योगेन्द्र यादव ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। योगेंद्र यादव ने जनहित याचिका दायर कर SIR की प्रक्रिया को मनमाना और चुनाव से जुड़े कानूनों के खिलाफ बताते हुए इस पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है। योगेंद्र यादव ने याचिका में आशंका जताई है कि चुनाव आयोग के इस कदम से राज्य के आगामी विधानसभा चुनावों में लोग बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित हो सकते हैं। याचिका में कहा गया का है कि इस SIR प्रक्रिया के तहत पुराने पंजीकृत मतदाताओं को अपनी पात्रता फिर से साबित करनी पड़ रही है और इसके लिए सिर्फ 11 दस्तावेजों की सीमित सूची निर्धारित की गई है। इन दस्तावेजों में आधार कार्ड, राशन कार्ड, और मनरेगा जॉब कार्ड जैसे आम प्रमाणपत्रों को शामिल नहीं किया गया है, जिससे लाखों लोगों के नाम हटाए जाने की आशंका है।
वोटर लिस्ट के वेरिफिकेशन के लिए 25 जुलाई, 2025 की डेडलाइन निर्धारित की गई है। जरूरी कागजात के साथ इस समयसीमा के भीतर वेरिफिकेशन फॉर्म न भरने पर मतदाताओं का नाम स्वतः हटा दिया जाएगा। याचिका में कहा गया है कि इस प्रक्रिया में प्रभावित व्यक्ति को सुनवाई का कोई अवसर नहीं दिया गया है, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। योगेंद्र यादव ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि पुरानी मतदाता सूची के अनुसार ही चुनाव कराया जाए। याचिका में यह भी कहा गया है कि वोटर लिस्ट वेरिफिकेशन की इस प्रक्रिया से समाज के हाशिए पर खड़े वर्ग के मतदाताओं जैसे महिलाएँ, अनुसूचित जाति/जनजाति समुदाय, और प्रवासी मज़दूरों पर असर पड़ेगा। क्योंकि इनमें से अधिकांश के पास निर्धारित दस्तावेज नहीं होते।
#BREAKING Plea in Supreme Court challenges Election Commission of India's order for a Special Intensive Revision of Electoral Roll in Bihar.
The petition filed by Association for Democratic Reforms @adrspeaks contends that the ECI order is arbitrary and can disenfranchise… pic.twitter.com/qRRGZTisPx
— Live Law (@LiveLawIndia) July 5, 2025
याचिका में कहा गया है कि वोटर लिस्ट के वेरिफिकेशन के लिए मात्र 90 दिन की निर्धारित समयसीमा में बरसात के इस मौसम में जन्म प्रमाण पत्र, ज़मीन के कागज़ या पहचान पत्रों को बनवा पाना और भी कठिन हो जाता है। याचिका में मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए कहा गया है कि यह प्रक्रिया बिहार के 7.89 करोड़ मतदाताओं के बीच भारी भ्रम की स्थिति पैदा कर रही है।
याचिका में कहा गया है कि SIR प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व क़ानून 1950 की धारा 22 और निर्वाचक नियम, 1960 के नियम 21- A का उल्लंघन करती है, जिनमें नाम हटाने से पहले प्रक्रियात्मक सुरक्षा (procedural safeguards) आवश्यक है। साथ ही, यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15 (भेदभाव निषेध), और 326 (लोकतांत्रिक अधिकार) का भी उल्लंघन करती है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के लाल बाबू हुसैन बनाम चुनाव अधिकारी (1995) के फैसले का हवाला देते हुए कहा गया है कि पहले से पंजीकृत मतदाताओं की निरंतरता को बनाए रखना संवैधानिक रूप से आवश्यक है।
बिहार में जितनी चर्चा विधानसभा चुनाव को लेकर है उससे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि वहां के लोग वोट कैसे डालेंगे। राज्य में चुनाव से ठीक पहले, चुनाव आयोग द्वारा राज्य में मतदाताओं का ‘विशेष गहन परीक्षण’ (SIR) कराया जा रहा है। इसके लिए चुनाव आयोग की ओर से मांगे गए डॉक्यूमेंट्स को लेकर राज्य में मतदाताओं में भगदड़ मची हुई है। लोग जरूरी कागजात बनवाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं।