के परासरन: रामलला के वकील (फोटो: यूट्यूब)
रामचरितमानस में तुलसीदास ने लिखा है कि वनवास जाते समय केवट भगवान राम, पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण को गंगा पार कराने में आनाकानी करता है। क्योंकि उसे भय है कि उसकी नाव कहीं नारी न बन जाये। केवट भगवान राम के प्रभुत्व से परिचित था। अंत में भगवान का पांव पखाकर अपनी नांव पर बैठाता है। नदी पार करने के बाद जब भगवान राम ने केवट को माता सीता की रत्नजड़ित अगूंठी नाव उतराई के तौर पर देना चाहा तो केवट ने हाथ जोड़कर प्रभु से कहा ‘अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीन दयाल अनुग्रह तोरें।’ अर्थात आपकी कृपा मिल गयी, मुझे और किसी वस्तु की कामना नहीं रही। राममंदिर विवाद में त्रेतायुग वाले केवट की वही भूमिका रामलला के वकील के परासरन ने निभाई। परासरन ने इस कलयुग में जन्मस्थान की कानूनी लड़ाई की मझधार से भगवान को पार दिलायी है! 92 साल के परासरन ने एक बार कहा था कि उनकी आखिरी ख्वाहिश यही है कि उनके जीते जी रामलला अपने जन्मस्थान पर कानूनी तौर पर विराजमान हो जायें। भगवान को कानूनी जीत दिलाने के बाद परासरन ने अपने पूरे परिवार के साथ अयोध्या जाकर रामलला का दर्शन भी किया था।
रामलला के वकील के परासरन भगवान राम के अनन्य भक्त हैं। एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि 1956 से नियमित रूप से रामायण का पाठ करते हैं। अयोध्या मामला कोई पहला मामला नहीं है जिसमें उन्होंने भगवान के लिए पैरवी की। सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट से जुड़े मामले में सरकार और रामसेतु बचाने की लड़ाई लड़ने वाले, दोनों पक्षों ने परासरन से केस लड़ने का अनुरोध किया था। लेकिन परासरन ने रामसेतु बचाने की लड़ाई में साथ दिया था। उन्होंने केस की सुनवाई के दौरान अदालत में कहा था कि “मैं अपने राम के लिए इतना तो कर ही सकता हूँ।” इससे जाहिर होता है कि उनके जीवन में भगवान राम की क्या महत्ता है।
सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले में भी परासरन ने सुप्रीम कोर्ट में भगवान अयप्पा के लिए दलीलें दी थीं। परासरन ने सबरीमला मंदिर विवाद में नायर सर्विस सोसाइटी की तरफ 10 से 50 वर्ष की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की पाबंदी की प्रथा का बचाव करते हुए दलील दी थी कि भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं और उनके ब्रह्मचारी स्वरूप को बनाये रखने के लिए यह प्रथा बनी रहनी चाहिए। यह एक संयोग है कि एक कोर्ट रिपोर्टर के तौर पर मैं इन तीनों मौकों का गवाह रहा।
मुझे याद है जब अयोध्या मामले की सुनवाई के दौरान परासरन की उम्र को देखते हुए मुख्यन्यायाधीश रंजन गोगाई ने उनसे बैठकर दलील देने की बात कही थी तो परासरन ने बहुत विनम्रता से अस्वीकार करते हुए कहा था कि ‘कोर्ट की परंपरा खड़े होकर बहस करने की है और मुझे परंपरा का ध्यान रखना है।’ एक एडवोकेट ने तो मुझे यह भी बताया था कि अयोध्या मामले में सुनवाई के दौरान परासरन साहब अपने जूते निकाल कर दलील देते थे। हालांकि मैंने देखा है कि जब संविधानपीठ के सामने किसी मामले की सुनवाई दिन दिन भर चलती है तो दलील पेश कर रहे वकील अक्सर पांव से जूता निकाल देते हैं क्योंकि दिनभर जूता पहनकर खड़ा रहना आरामदायक नहीं होता। लेकिन परासरन के लिए वजह वह नहीं थी जो बाकी वकीलों के लिए होती है। परासरन साहब अपने आराध्य भगवान राम का मुकदमा लड़ रहे थे, जूता पहनकर कैसे दलील देते!
अपने कानूनी दलीलों के अलावा परासरन ने कुछ ऐसी दलीलें भी दी थीं जो एक वकील से ज्यादा रामभक्त की ज्यादा लगीं। उन्होंने दलील दी थी कि अयोध्या में 55-60 मस्जिदें हैं। मुस्लिम समुदाय के लोग किसी दूसरी मस्जिद में नमाज पढ़ सकते हैं, लेकिन यह हिंदुओं के लिए भगवान राम का जन्मस्थान है और हम उनके जन्मस्थान में बदलाव नहीं कर सकते। रामभक्त परासरन ने एक और भवनात्मक दलील दी थी कि रामनवमी को भगवान राम के जन्मदिन के तौर पर मनाया जाता है लेकिन यह भगवान राम के जन्मस्थान पर नहीं मनाया जाता। जिस प्रकार कृष्ण का भव्य जन्मोत्सव उनके जन्मस्थान मथुरा में मनाया जाता है वैसा ही भगवान राम का जन्मोत्सव भी उनके जन्मस्थान पर मन्दिर बनाकर वहां मनाना चाहिए।
(एक रूका हुआ फ़ैसला: अयोध्या विवाद के आख़िरी चालीस दिन, पुस्तक से। पुस्तक अमेज़न पर उपलब्ध है।)