श्वेताश्री मजूमदार (फोटो सौजन्य: फीडस लॉ चैंबर्स )
दिल्ली हाईकोर्ट की एडवोकेट श्वेताश्री मजूमदार अब हाईकोर्ट की जज नहीं बनेंगी। श्वेताश्री ने जज बनने की अपनी सहमति वापस ले ली है। तत्कालीन सीजेआई जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ के समय सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने पिछले साल 21 अगस्त को दो अन्य वकीलों अजय दिगपाल और हरीश वैद्यनाथन शंकर के नाम के साथ श्वेताश्री मजूमदार को भी हाईकोर्ट का जज बनाने की सिफारिश सरकार को भेजी थी। केंद्र सरकार ने 6 जनवरी 2025 को अजय दिगपाल और हरीश वैद्यनाथन शंकर के नाम पर मुहर लगा दी थी। जबकि श्वेताश्री के नाम पर सरकार ने अभी तक कोई फैसला नहीं लिया है। उनकी फाइल को मंजूरी देने में अत्यधिक देरी के बाद अब नियुक्ति के लिए उन्होंने अपनी सहमति वापस ले ली है। कॉलेजियम किसी एडवोकेट को जज बनाने की सिफारिश करने से पहले उसकी सहमति लेती है।
इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी एक्सपर्ट, श्वेताश्री मजूमदार लॉ फर्म ‘फिडस लॉ चैंबर्स’ की मैनेजिंग पार्टनर हैं। उन्होंने नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु से क़ानून को पढ़ाई किया है। श्वेताश्री अलग अलग हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के सामने 500 से अधिक मामलों में पेश हो चुकी हैं।
हालांकि श्वेताश्री मजूमदार का मामला कोई पहला मामला नहीं है जिसमें सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम की सिफारिश के बावजूद सरकार ने जज न बनाया हो। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट कॉलिजियम ने सीनियर एडवोकेट सौरभ कृपाल को दिल्ली हाईकोर्ट का जज नियुक्त करने की सिफारिश की थी। लेकिन सरकार ने उनके सेक्सुअल ओरियंटेशन के चलते सिफारिश नामंजूर कर दी थी। पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी एन कृपाल के बेटे सौरभ कृपाल समलैंगिक हैं, उनका पार्टनर एक विदेशी है, इसलिए सरकार उनकी नियुक्ति के खिलाफ थी। सुप्रीम कोर्ट को सरकार की ये दलील उचित नहीं लगी। कॉलेजियम ने कहा कि सौरभ कृपाल ने अपनी लैंगिकता कभी छिपाई नहीं है। वह इस मामले पर खुलकर बोलते हैं। कॉलेजियम ने सौरभ कृपाल को हाईकोर्ट का जज बनाने की सिफारिश सरकार के पास दोबारा भेजा था। लेकिन वो फाइल जनवरी 2023 से सरकार के पास आज भी पड़ी है। व्यवस्था के मुताबिक कॉलेजियम की सिफारिश को सरकार केवल एक बार लौटा सकती है। कॉलेजियम यदि उसी नाम की सिफारिश दोबारा करती है तो सरकार उसे लौटा नहीं सकती। लेकिन सरकार अगर उस व्यक्ति की नियुक्ति नहीं करना चाहती है तो फाइल पर कोई निर्णय ही नहीं लेती और फाइल पड़ी रह जाती है।
सीनियर एडवोकेट गोपाल सुब्रमण्यम के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। यह घटना 2014 की है। उस समय तत्कालीन सीजेआई जस्टिस आर एम लोढ़ा की अगुवाई वाली पाँच सदस्यीय कॉलेजियम ने तीन अन्य नामों के साथ सीनियर एडवोकेट गोपाल सुब्रमण्यम को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने की सिफारिश की थी। नई नई सत्ता में आई एनडीए सरकार को गोपाल सुब्रमण्यम के नाम पर आपत्ति थी। गोपाल सुब्रमण्यम यूपीए सरकार के समय सॉलिसिटर जनरल रहे थे और सोहराबुद्दीन केस से भी जुड़े रहे थे। नई सरकार ने चीफ जस्टिस से गोपाल सुब्रमण्यम के नाम पर दोबारा विचार करने के लिए कहा। इससे आहत होकर गोपाल सुब्रमण्यम ने जज बनने की अपनी सहमति वापस ले ली थी।