एम के गाँधी बैरिस्टर
गांधीजी कानून की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गये, पर मन में नई चिन्ताएं और सन्देह उभरने लगे। कानून तो पढ़ लिया, पास भी हो गये, मगर वकालत कर भी पाएंगे ? चार अजनबी व्यक्तियों के बीच तो उनसे बोलते नहीं बनता था, भरी अदालत में विरोधी पक्ष के वकील से जिरह और बहस कैसे कर सकेंगे ? बम्बई के सर फीरोजशाह मेहता जैसे महान वकीलों के विषय में वह सुन चुके थे। ऐसे धाकड़ वकीलों के सामने पड़ जाने पर उनकी जो दुर्गति होगी, उसकी कल्पना वह सहज ही कर सकते थे। इस प्रकार जब वह भारत के लिए रवाना हुए तो उनके मन में “घोर निराशा के बीच आशा की एक किरण मात्र विद्यमान थी।”
आइए जानते हैं महात्मा गांधी के पहले मुकदमे की कहानी, जब अदालत से भाग खड़ा हुए थे,एडवोकेट मोहनदास करमचंद गांधी!