मद्रास हाई कोर्ट ने अपनी एक अहम टिप्पणी में कहा है कि विरोध-प्रदर्शन राजनीतिक दलों की मनमानी पर नहीं होने चाहिए। जस्टिस बी. पुगालेंधी ने कहा कि आम जनता के प्रति राजनीतिक दलों की ज़िम्मेदारी होती है जो इन विरोध प्रदर्शनों से प्रभावित होती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि विरोध प्रदर्शन के अधिकार का प्रभाव उन लोगों पर नहीं पड़ना चाहिए जो उन इन प्रदर्शनों से जुड़े नहीं होते।
“प्रदर्शन करना कोई मनोरंजन का साधन नहीं है और ऐसे प्रदर्शन राजनीतिक दलों की मनमानी पर नहीं किए जा सकते। राजनीतिक दलों की आम जनता के प्रति कुछ ज़िम्मेदारियाँ होती हैं, जो उनके प्रदर्शनों से प्रभावित हो सकते हैं। कोई भी प्रदर्शन निश्चित रूप से आम जनता की स्वतंत्र आवाजाही के अधिकार को प्रभावित करता है और उस क्षेत्र के लोगों की दिनचर्या में विघ्न डालता है।”
– मद्रास हाईकोर्ट
कोर्ट ने यह भी कहा कि विरोध प्रदर्शन का अधिकार आम जनता को असुविधा पहुँचाने का अधिकार नहीं देता। इस अधिकार का प्रयोग ऐसे ढंग से नहीं होना चाहिए जिससे समाज में किसी प्रकार की अव्यवस्था और अशांति फैले। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर विरोध प्रदर्शन किए जा सकते हैं, लेकिन उनके मूल उद्देश्य को नहीं भुलाया जाना चाहिए।
कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि ‘विरोध करने का अधिकार आम जनता और उन लोगों के अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकता जो विरोध में शामिल नहीं हैं। विरोध का अधिकार, जनता को असुविधा पहुँचाने का अधिकार नहीं है। यह एक पवित्र लोकतांत्रिक अधिकार है जिसका प्रयोग लापरवाही से बार-बार लोगों को परेशान करने या सामाजिक असामंजस्य फैलाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। सार्वजनिक स्थलों पर विरोध करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वहाँ मौजूद किसी तरह परेशान न हों। …कोई भी व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता कि उसे बिना किसी प्रतिबंध के बार-बार एक ही स्थान पर प्रदर्शन करने की अनुमति मिलनी चाहिए।’
मद्रास हाईकोर्ट नाम तमिझर कच्ची (Naam Tamilar Katchi) की याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें हिरासत में हुई एक मौत के विरोध में 8 जुलाई को विरोध प्रदर्शन की अनुमति न देने के पुलिस प्रशासन के फैसले को चुनौती दी गई थी। पार्टी का तर्क था कि पुलिस ने अन्य राजनीतिक दलों को इसी मुद्दे पर प्रदर्शन की अनुमति दी, लेकिन उसे इजाजत नहीं दी जो पक्षपातपूर्ण है। इसके जवाब में पुलिस ने अदालत को बताया कि यह पार्टी पहले ही 3 जुलाई 2025 को इसी मुद्दे और उसी स्थान पर प्रदर्शन कर चुकी है। इस पर पार्टी ने कहा कि 3 जुलाई को हुए प्रदर्शन में पार्टी नेता को भाग लेने से पुलिस ने मना कर दिया था, इसलिए अब वे अपने नेता के साथ मिलकर प्रदर्शन करना चाहते हैं।
कोर्ट ने माना कि राज्य ने इस आधार पर अनुमति से इनकार किया कि उसी विषय पर, उसी स्थान पर पहले ही एक प्रदर्शन हो चुका है। इसके अलावा, कोर्ट को बताया गया कि उसी दिन वहाँ रथ यात्रा आयोजित होने वाली है, और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल उसकी ड्यूटी में तैनात रहेगा। राज्य ने यह भी कहा कि प्रस्तावित स्थल के पास सरकारी कार्यालय, स्कूल, अस्पताल आदि स्थित हैं, जिससे ट्रैफिक जाम की आशंका है। साथ ही, उसी दिन साप्ताहिक बाज़ार भी लगता है, जिससे व्यापार में बाधा आ सकती है।
कोर्ट ने पुलिस द्वारा बताए गए कारणों को उचित माना। चूंकि पार्टी ने कहा कि उनके नेता ने पिछले प्रदर्शन में भाग नहीं लिया, इसलिए कोर्ट ने पार्टी को नई याचिका दाखिल करने का निर्देश दिया और संबंधित अधिकारियों को 24 घंटे के भीतर उस पर निर्णय लेने का आदेश दिया।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात का भी संज्ञान लिया कि 3 जुलाई को हुए प्रदर्शन में भाग लेने वाले कुछ वक्ताओं द्वारा सांप्रदायिक बयान दिए गए थे, जो महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुँचा वाले थे। हालांकि राज्य सरकार ने उन बयानों को देने वाले व्यक्ति के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, लेकिन कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे कानून को उसके सही भावना के साथ लागू करें।