“बेल इज द रूल, जेल इज एक्सेप्शन”इस कानूनी सिद्धांत को सुप्रीम कोर्ट के द्वारा अक्सर उद्धृत किया जाता है। यह सिद्धांत भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली (criminal justice system) का एक आधारभूत स्तंभ है। यह विचार का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी आरोपी को मुकदमे की प्रतीक्षा के दौरान स्वतंत्रता प्रदान की जाए, न कि उसे जेल में रखा जाए। यह सिद्धांत इस धारणा पर आधारित है कि जब तक किसी किसी व्यक्ति पर लगे आरोप सिद्ध नहीं हो जाते, तब तक वह निर्दोष माना जाता है। और यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को बनाए रखता है।
संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है, जिसे कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही छीना जा सकता है। कानून यह निर्धारित करता है कि किसी भी अपराध के आरोपी व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार प्राप्त हो और इस निष्पक्षता का एक हिस्सा यह सुनिश्चित करना है कि आरोपी को मुकदमे से पहले अनावश्यक रूप से हिरासत में न रखा जाए।
आज से लगभग 48 साल पहले एक ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा इस सिद्धांत को प्रतिपादित किया था। 1977 में ‘राजस्थान राज्य बनाम बलचंद उर्फ बालिया’ मामले में वादी को जमानत देते हुए जस्टिस वी आर कृष्णा अय्यर ने अपने फैसले में इसे लिखा था। जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर ने अपने फैसले में लिखा था कि मूल नियम जमानत है, जेल नहीं, सिवाय उन परिस्थितियों के जब इस बात की आशंका हो कि आरोपी भाग सकता है, न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डाल सकता है, अपराधों को दोहरा सकता है, गवाहों को डरा सकता है, या इसी प्रकार की अन्य परेशानियाँ खड़ी कर सकता है।” अदालतों को ऐसे मामलों में ही जमानत से इनकार किया जाना चाहिए, अन्यथा नहीं। इस फैसले के बाद ‘बेल इज रूल, जेल इज एक्सेप्शन’ का यह सिद्धांत एक स्थापित न्यायिक सिद्धांत बन गया है जिसे कई मामलों में अदालतों द्वारा उद्धृत किया जाता रहा है।
1973 की आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) इस सिद्धांत को अपनी जमानत संबंधी धाराओं के माध्यम से और अधिक पुष्ट करती है। CrPC की धाराएं 436, 437 और 439 जमानत देने के नियम निर्धारित करती हैं। धारा 436 जमानती अपराधों में जमानत का प्रावधान करती है, जो लगभग एक अधिकार होता है, जबकि धारा 437 गैर-जमानती अपराधों से संबंधित है, जिसमें न्यायिक विवेक के आधार पर जमानत दी जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2G स्पेक्ट्रम मामले में नवंबर 2011 के फैसले में संजय चंद्रा सहित पांच आरोपियों को जमानत देते समय इस सिद्धांत को दोहराया और कहा कि सुप्रीम कोर्ट बार-बार यह कह चुका है कि ‘बेल इज द रूल, जेल इज एक्सेप्शन’। 2019 में INX मीडिया मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम को जमानत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आर्थिक अपराध गंभीर हो सकते हैं, लेकिन जमानत से जुड़ा सिद्धांत यही है कि बेल देना नियम है और इनकार करना अपवाद, ताकि आरोपी निष्पक्ष सुनवाई का लाभ ले सके।
पिछले साल प्रबीर पूरकायस्थ, मनीष सिसोदिया और के कविता के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने ‘बेल इज द रूल, जेल इज एक्सेप्शन’ के सिद्धांत को दोहराया था। प्रबीर पूरकायस्थ को दिल्ली पुलिस ने अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रीवेंशन) एक्ट (UAPA) के तहत गिरफ्तार किया था। के कविता और मनीष सिसोदिया को दिल्ली के आबकारी नीति घोटाला मामले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में गिरफ्तार किया गया था। के कविता पांच महीने बाद जमानत पर रिहा हुई थीं। वहीं, मनीष सिसोदिया को 17 महीने जेल में रहने के बाद बेल मिली थी। ये दोनों दिल्ली के शराब नीति घोटाला मामले में जेल में बंद थे। इन मामलों में ट्रायल शुरू होने में देरी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ईडी और सीबीआई दोनों केस में जमानत दे दी थी।
हालांकि, कुछ अवसरों पर अदालतों ने यह भी कहा कि यह ‘बेल इज रूल’ वाला सिद्धांत हर मामले में समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता। जस्टिस वी आर कृष्ण अय्यर ने भी अपने फैसले में लिखा था जब इस बात की आशंका हो कि आरोपी भाग सकता है, न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डाल सकता है, अपराध को दोहरा सकता है, गवाहों को डरा सकता है, या इसी प्रकार की अन्य परेशानियाँ खड़ी कर सकता है, केवल ऐसी स्थिति में ही अदालत आरोपी को जमानत देने से इंकार कर सकती है। जस्टिस कृष्ण अय्यर के फैसले के इस अपवाद को अक्सर अदालतें बहुत गंभीरता से लेती हैं। और अदालतों पर आरोप लगता है कि केवल नेताओं और हाई प्रोफाइल आरोपियों में मामलों में ही अदालतों को यह सिद्धांत याद रहता है। बाक़ी मामलों में अक्सर भूल जाती हैं। दिल्ली दंगा के साजिश के आरोपी उमर खालिद और शारजील इमाम UAPA के तहत पिछले पांच साल से तिहाड़ जेल में बंद हैं और जमानत का इंतजार कर रहे हैं।