असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM की मान्यता रद्द करने की मांग वाली शिवसेना नेता की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इंकार किया। याचिका में कहा गया था कि ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिममीन (AIMIM) एक सम्प्रदायिक पार्टी है, जिसका एकमात्र मकसद सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम समुदाय के हितों के लिए काम करना है। जो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों के खिलाफ है। याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि AIMIM का घोषित उद्देश्य केवल मुस्लिम समुदाय की सेवा करना है। इस पार्टी का संविधान, धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। इसलिए इस पार्टी को जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29A के तहत एक राजनीतिक पार्टी के रूप में पंजीकृत नहीं किया जा सकता।
जस्टिस सूर्यकांत ने AIMIM के संविधान पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस पार्टी के संविधान के अनुसार उनका उद्देश्य समाज के हर पिछड़े वर्ग के लिए काम करना है। यह समाज के हर पिछड़े वर्ग के लिए है, जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय के लोग भी शामिल हैं, जो आर्थिक रूप से और शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े हैं। और यही बात संविधान में कही गई है। संविधान के तहत अल्पसंख्यकों को कुछ अधिकार दिए गए हैं। AIMIM के संविधान में कहा गया है कि वे संविधान के तहत दिए गए उन अधिकारों की रक्षा के लिए काम करेंगे।
कोर्ट की इस टिप्पणी पर विष्णु शंकर जैन ने कहा कि इस पार्टी के संविधान में यह भी कहा गया है कि यह मुस्लिमों के बीच इस्लामी शिक्षा को बढ़ावा देगी। क़ुरान पढ़ना और उसे समझना, मुस्लिमों में शरीयत कानून का पालन करने की सामान्य जागरूकता पैदा करेगी। जबकि यदि आज मैं हिंदू नाम से चुनाव आयोग के पास जाऊं और यह लिखकर दूं कि मैं वेदों और उपनिषदों की शिक्षा देना चाहता हूं, तो चुनाव आयोग पंजीकरण नहीं करेगा। इसपर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अगर चुनाव आयोग वेद, पुराण, शास्त्र या किसी ग्रंथ की शिक्षा पर आपत्ति जताता है, तो आप उचित मंच पर जाएं। क़ानून इस पर ध्यान देगा। हमारे पुराने ग्रंथों, पुस्तकों, साहित्य या इतिहास को पढ़ने में कुछ भी गलत नहीं है। क़ानून के तहत इस पर कोई पाबंदी नहीं है।
विष्णु शंकर जैन ने दलील को आगे बढ़ाते हुए कहा कि कोई राजनीतिक पार्टी यह क्यों घोषित करे कि वह केवल मुस्लिमों के लिए काम करेगी, सभी के लिए क्यों नहीं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के अभिराम सिंह बनाम सीडी कॉमचेन मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि धर्म के नाम पर वोट मांगना, चाहे वह उम्मीदवार का धर्म हो या मतदाता का, एक भ्रष्ट आचरण है। जैन ने तर्क दिया कि इस फैसले की भावना के अनुसार AIMIM का पंजीकरण अवैध है। जैन ने यह भी तर्क दिया कि एक कानून शून्यता (legal vacuum) है, जिसका कई राजनीतिक पार्टियाँ फायदा उठा रही हैं। जब जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123(3) के तहत धर्म के नाम पर वोट मांगना भ्रष्ट आचरण माना गया है, तो धार्मिक उद्देश्यों वाली पार्टी को चुनाव लड़ने की अनुमति कैसे दी जा सकती?
जस्टिस सूर्यकांत ने यह स्वीकार किया कि यह एक ग्रे एरिया है।उन्होंने याचिका पर सुनवाई से इंकार करते हुए कहा कि कुछ ऐसे दल भी हैं जो जातियों की राजनीति करते हैं, यह भी उतना ही खतरनाक है। आप चाहें तो व्यापक परिप्रेक्ष्य में बिना किसी पार्टी का नाम लिए या ऐसी सभी पार्टियों पर आरोप लगाया गया हो, याचिका दायर कर सकते हैं! शिवसेना नेता तिरुपति नरसिम्हा मुरारी ने याचिका दायर की थी।