जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस पी वी संजय कुमार
बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में भी समझौते से मुकदमा रद्द हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि यदि शिकायतकर्ता नहीं चाहता कि केस आगे चले और दोनों पक्षों ने आपसी समझौते से विवाद सुलझा लिया हो तब असाधारण परिस्थितियों में मुकद्दमा रद्द किया जा सकता है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस पी वी संजय कुमार की बेंच ने अपने फैसले में कहा है कि भले ही भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत बलात्कार एक जघन्य अपराध है और आमतौर पर ऐसे मामलों से जुड़े मुकदमे को समझौते के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता। लेकिन केस के तथ्यों के मूल्यांकन के बाद यदि अदालत को लगता है कि किसी विशेष मामले के तथ्य ऐसे हैं तो अदालत उसे रद्द करने पर विचार कर सकती है।
“भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत बलात्कार एक जघन्य अपराध है और आमतौर पर ऐसे मामलों से जुड़े मुकदमे को समझौते के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता। लेकिन केस के तथ्यों के मूल्यांकन के बाद यदि अदालत को लगता है कि किसी विशेष मामले के तथ्य ऐसे हैं तो अदालत उसे रद्द करने पर विचार कर सकती है।” – सुप्रीम कोर्ट।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि धारा 376 IPC के तहत रेप का अपराध निस्संदेह गंभीर और जघन्य है। सामान्यतः ऐसे मामलों में समझौते के आधार पर कार्यवाही रद्द करना हतोत्साहित किया जाता है और इसे मनमाने ढंग से अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन यदि कोर्ट को किसी मामले के तथ्यों को देखकर लगता है कि मामले को रद्द करना न्याय के हित में है तो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट न्याय की प्राप्ति के लिए ऐसा आदेश दे सकता है। धारा 482 के तहत हाईकोर्ट को किसी आपराधिक मामले में दख़ल देने या उसे रद्द करने के का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि धारा 482 के तहत हाईकोर्ट की शक्ति किसी कठोर नियम से बंधी नहीं हो सकती। इसे हर मामले के तथ्यों के अनुसार प्रयोग किया जाना चाहिए।
नवंबर 2023 में महाराष्ट्र के जलगांव स्थित मेहुनबारे पुलिस स्टेशन में दो एफआईआर दर्ज हुई। पहली एफआईआर में आरोपियों के खिलाफ दंगा, हमला और आपराधिक धमकी (आईपीसी की धाराएं 324, 143, 147, 452) के तहत शिकायत दर्ज की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि आरोपियों ने एक तलाक के मामले को लेकर शिकायतकर्ता और उसके परिवार पर हमला किया था। उसके दो दिन बाद, दूसरी एफआईआर धारा 376 (बलात्कार), 354-ए (यौन उत्पीड़न) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दर्ज की गई। इसमें जो आरोपी था वह पिछले FIR के में शामिल एक आरोपी का पिता था।
आरोपियों ने दोनों एफआईआर को खारिज करने की मांग करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट (औरंगाबाद बेंच) का दरवाजा खटखटाया। मार्च 2024 में पीड़िता ने कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा कि दोनों पक्षों ने समझौते से मामला सुलझा लिया है और उसने आरोपी से 5 लाख रुपये की मदद ली है। अब वह आगे केस नहीं लड़ना चाहती। और आरोपियों को जमानत देने में उसे कोई आपत्ति नहीं है।
लेकिन हाईकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि आईपीसी की धारा 376 के तहत का अपराध गंभीर और गैर-समझौता योग्य है। इसे केवल समझौते या मुआवजे के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि बलात्कार सिर्फ व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि समाज के खिलाफ अपराध है, इसलिए इसे निजी समझौतों से नहीं निपटाया जा सकता।
हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों FIR को रद्द करने का फैसला सुनाते हुए कहा कि दोनों पक्षों ने आपस में सुलह कर ली है और अब आगे बढ़ना चाहते हैं। शिकायतकर्ता लड़की ने कहा है कि अब उसकी शादी हो चुकी है। वह अपने पति के साथ रह रही है, और अगर मुकदमा चलता रहा तो इससे उसकी निजी ज़िंदगी में और परेशानी होगी। ऐसे में मुकदमे को जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है। इससे केवल केस से जुड़े सभी लोगों, विशेष रूप से शिकायतकर्ता की मानसिक पीड़ा बढ़ेगी और अदालतों पर भी अनावश्यक बोझ पड़ेगा।