आपका आचरण अविश्वास पैदा करता है : सुप्रीम कोर्ट
घर पर कैश मिलने के मामले को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा को पद से हटाने के लिए सरकार उधर महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रही है। दूसरी तरफ जिस रिपोर्ट को आधार बनाकर महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी हो रही है, जस्टिस यशवंत वर्मा ने उस रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी है। उन्होंने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना के द्वारा गठित तीन सदस्यीय इन हाउस कमेटी की रिपोर्ट को अमान्य घोषित करने की मांग की है। जस्टिस वर्मा की दलील है कि जांच कमेटी ने एक बार भी ठीक तरीके से उन्हें अपना पक्ष रखने की अनुमति नहीं दी। कमेटी ने एक निश्चित सोच के तहत काम किया गया और अपना निष्कर्ष भी निकाल लिया।
याचिका में कहा गया है कि इन हाउस कमेटी की जांच की प्रक्रिया की शुरुआत अनुचित और अमान्य थी, क्योंकि यह याचिकाकर्ता के विरुद्ध किसी औपचारिक शिकायत (FIR)के अभाव में शुरू की गई थी। यह कार्यवाही मात्र अनुमान के आधार पर तय किए गए प्रश्नों से शुरू हुई थी, जो इस बिना किसी प्रमाण के तय किए गए थे। जस्टिस वर्मा ने अपनी याचिका में कहा है कि कमेटी ने यह मानकर जांच शुरू किया कि उनके घर में अज्ञात मात्रा में नकदी था और उसके पकड़े जाने के बाद उसने उन्होंने उसे वहां से हटवा दिया। कमेटी ने इस बात की जांच नहीं कि पैसा कितना था, किसका था और कहां से आया था। उन्होंने याचिका में कहा है कि आरोपों की बिना पुष्टि हुए, रिपोर्ट को सार्वजनिक किए जाने से उन्हें मीडिया ट्रायल से गुजरना पड़ा है। जिससे उनकी प्रतिष्ठा और जज के रूप में उनके करियर को अपूरणीय क्षति पहुंची है।
जस्टिस वर्मा ने कमेटी की कार्यवाही पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यह कमेटी संविधान के अनुच्छेद 14 के अंतर्गत प्राकृतिक न्याय, औचित्य और निष्पक्षता का उल्लंघन करती है। समिति ने उनको न तो अपनाई गई प्रक्रिया से अवगत कराया और न ही उन्हें साक्ष्य पर अपनी राय देने का अवसर दिया। गवाहों से उसकी अनुपस्थिति में पूछताछ की गई और पूछताछ का वीडियो उपलब्ध नहीं कराया गया। उन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि इन हाउस कमेटी केवल उन विषयों की जांच तक ही सीमित रही कि क्या उनके बंगले के आउट हाउस में कैश मिला था ? और दूसरा, क्या वह आउट हाउस आवासीय परिसर का हिस्सा था। ये दोनों तथ्य विवाद का विषय नहीं थे, क्योंकि उन्होंने नकदी मिलने से कभी इनकार नहीं किया था और आउट हाउस, उनके आवासीय परिसर का हिस्सा था यह स्थान स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर था।
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जस्टिस वर्मा ने अपनी याचिका में कहा है कि कमेटी का अनिवार्य दायित्व था कि कम से कम निम्नलिखित मूलभूत तथ्यों की सच्चाई का पता लगाती कि:
1. नकदी कब, कैसे और किसके द्वारा आउट हाउस में रखी गई?
2. आउट हाउस में कितनी नकदी रखी गई थी?
3. कैश असली था या नकली था ?
4. आग लगने का कारण क्या था? और
5 क्या जस्टिस वर्मा, आग लगने वाली जगह से अवशेष बचे नोटों को हटाने में किसी भी तरह से शामिल थे? कमेटी ने इन सवालों का जवाब ढूंढने की कोशिश नहीं की। इन्हीं सवालों के जवाब के आधार पर उन्हें दोषी हैं या निर्दोष ठहराया जा सकता था। आगे उन्होंने लिखा है कि ऐसी असंगत रिपोर्ट के आधार पर उनको पद से हटने के लिए कहा गया। और उसी रिपोर्ट आधार पर मुख्य न्यायाधीश ने सरकार से उनके खिलाफ पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू करने को कहा, जो ग़लत है।
मामले की पृष्ठभूमि
दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास में होली की रात 14 मार्च को आग लग गई थी। उस वक्त वे और उनकी पत्नी भोपाल में थे। घर पर उनकी बेटी और बुजुर्ग मां मौजूद थीं। आग बुझाने पहुंचे अग्निशमन कर्मियों ने एक स्टोर रूम में नकदी से भरे बोरों में आग लगी हुई देखी। इसके बाद घटनास्थल से दो वीडियो सामने आने पर मामले ने तूल पकड़ा। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में जांच की सिफारिश की थी। उसके बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना के तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया था। कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर सीजेआई ने सरकार को लिखा था कि जस्टिस यशवंत वर्मा को पद से हटाने की कार्यवाही शुरू की जाए। 21 जुलाई से शुरू हो रहे मॉनसून सत्र में सरकार जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी में है।
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