शाह बानो केस जिसने बदल दी देश की सियासत
शाह बानो मामले को लेकर कांग्रेस पार्टी पर लगातार हमले होते रहे हैं। खासकर जब भी तुष्टीकरण, सुप्रीम कोर्ट के फैसले और संविधान के सम्मान की बात होती है तो बीजेपी की तरफ से इस मुद्दे को उठाया जाता रहा है। 1985 में शाह बानो नाम की महिला ने अपने पति से तलाक के बाद मेंटेनेंस ( गुजारा भत्ता) की मांग की थी। उनका पति कहता था कि वह सिर्फ ‘इद्दत’ यानी तीन महीने की अवधि तक ही मेंटेनेंस देने के लिए जिम्मेदार है। शाह बानो की दलील थी कि वह अपना गुजर बसर करने में सक्षम नहीं है, इसलिए उसे मेंटेनेंस चाहिए। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से फैसला दिया कि सीआरपीसी के सेक्शन 125 के तहत मुस्लिम तलाकशुदा महिलाएं भी गुज़ारा भत्ता पा सकती हैं। कोर्ट ने फैसले में कहा कि अगर कोई महिला खुद को संभालने में सक्षम नहीं है, तो उसके पति को उसे मेंटेनेंस देना होगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस फैसले से मुस्लिम पर्सनल लॉ का उल्लंघन नहीं हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल के तौर पर देखा गया और मुस्लिम कट्टरपंथियों ने विरोध शुरू कर दिया। उस समय केंद्र में राजीव गांधी की सरकार थी। मुस्लिम कट्टरपंथियों के विरोध के आगे राजीव गांधी सरकार ने घुटने टेक दिए। राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक में संरक्षण का अधिकार) कानून 1986 सदन में पेश किया। और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया। इस कानून में कहा गया कि तलाक के बाद पति को सिर्फ इद्दत की अवधि तक ही मेंटेनेंस देना होगा। बीजेपी ने इसे वोट बैंक की राजनीति के रूप में देखा और कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसने मुस्लिम समुदाय को खुश करने के लिए यह कदम उठाया है।
क्या थी शाह बानो की कहानी
कहानी शुरू होती है 70 के दशक से। इंदौर में एक बड़े वकील हुआ करते थे। नाम था मोहम्मद अहमद खान। शाहबानो उन्हीं की पत्नी थीं। अहमद खान ने 1975 में एक कम उम्र की लड़की से शादी कर ली और 43 साल तक साथ रही अपनी बीवी शाहबानो को उनके 5 बच्चों समेत घर से बाहर निकाल दिया। एक झटके में एक 59 साल की महिला बेघर हो गई। वकील साहब बच्चों की परवरिश के लिए कभी-कभी कुछ पैसे दे दिया करते थे लेकिन शाहबानो नियमित तौर पर हर महीने गुजारा-भत्ता की मांग कर रहीं थीं। इसे लेकर दोनों में अक्सर विवाद होते रहते थे। 6 नवंबर 1978 को मोहम्मद अहमद खान ने शाह बानो को तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) दे दिया। मेहर की रकम का भुगतान कर खान ने दो टूक कह दिया कि अब आगे एक नया पैसा नहीं देंगे।
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो को तलाक देने वाले शौहर खान साहब को हर महीने गुजारा भत्ता देने का फरमान सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यूनिफॉर्म सिविल कोड की जरूरत बताते हुए कहा था कि सरकार को इस पर विचार करना चाहिए।
यूनिफार्म सिविल कोड वाली सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को लेकर देशभर में इस फैसले का विरोध शुरू हो गया। मुस्लिम कट्टरपंथी इसे मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल बताकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध करने लगे। उस समय केंद्र में राजीव गांधी की सरकार थी। राजीव गांधी की सरकार ने कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक दिए, 1986 में संसद में कानून बनाकर फैसला पलट दिया।
राजीव गांधी की यह गलती कांग्रेस को भारी पड़ी। उस गलती का खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा। शाहबानो मामले में राजीव गांधी की सरकार के द्वारा उठाए गए कदम को लेकर देश भर में सरकार के खिलाफ एक माहौल देखने को मिला। 1984 के लोकसभा चुनाव में महज 2 सीटों पर चुनाव जीतने वाली बीजेपी ने इसे मुद्दा बनाया। बीजेपी ने सरकार पर तुष्टीकरण का आरोप लगाया। दवाब बढ़ता देखकर राजीव गांधी की सरकार ने एक के बाद एक फैसले लिए। उसी में से एक था राजीव गांधी द्वारा अयोध्या में विवादित परिसर का ताला खुलवाने का फैसला। राजीव गांधी सरकार के इस फैसले ने नए राजनीतिक मुद्दों को जन्म दिया। अयोध्या का मामला जो पहले राष्ट्रीय स्तर पर इतना व्यापक नहीं था वो पूरे देश में मुद्दा बन गया। बीजेपी को इसका फायदा हुआ। बीजेपी के उत्थान और कांग्रेस के पतन की जब भी बात होती है शाहबानो केस की चर्चा जरूर होती है।