महाभियोग की प्रक्रिया तो केवल राष्ट्रपति के लिए है (फोटो/AI जनरेटेड)
आम बोलचाल की भाषा में लोग हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया को महाभियोग बोल देते हैं जबकि भारत में महाभियोग (Impeachment) की प्रक्रिया संविधान द्वारा केवल राष्ट्रपति के लिए निर्धारित की गई है। बाकी संवैधानिक पदाधिकारियों जैसे सुप्रीम कोर्ट/हाईकोर्ट के जज, CAG, चुनाव आयुक्त आदि को हटाने के लिए अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं, जो भले ही संसद द्वारा ही संचालित होती हैं, लेकिन उन्हें तकनीकी रूप से महाभियोग नहीं कहा जाता।
संविधान के अनुच्छेद 61 में राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया दी हुई है। संसद, राष्ट्रपति को संविधान के उल्लंघन के लिए महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा उन्हें पद से हटा सकती है। लेकिन संविधान में ये नहीं बताया गया है कि संविधान का उल्लंघन कब माना जाएगा!
महाभियोग की प्रक्रिया:
1. लोकसभा या राज्यसभा में कम से कम 1/4 सदस्यों द्वारा आरोपों का लिखित नोटिस।
2. नोटिस मिलने के 14 दिन बाद संसद में बहस।
3. दोनों सदनों में 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पास होना चाहिए (उपस्थित और मतदान करने वालों का)।
4. प्रस्ताव पारित होने पर राष्ट्रपति पद से हटाए जाते हैं।
भारत में आजतक किसी राष्ट्रपति के खिलाफ न कभी महाभियोग शुरू हुई और न ही इस की प्रक्रिया से आजतक किसी राष्ट्रपति को हटाया गया है।
जजों को हटाने की प्रक्रिया – Removal
जजों को पद से हटाने के लिए संविधान में महाभियोग शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। पद से हटाना ( removal ) शब्द का प्रयोग किया गया है। भारत में हाईकोर्ट जजों के लिए अनुच्छेद 217 में और सुप्रीम कोर्ट के जजों को पद से हटाने के लिए अनुच्छेद 217 में व्यवस्था दी गई है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को पद से हटाने की प्रक्रिया में कोई अंतर नहीं है।
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को पद से हटाने की प्रक्रिया को 6 चरणों में समझा जा सकता है:
चरण 1: नोटिस – लोकसभा के संसद 100 या राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ संबंधित सदन में लिखित में नोटिस दिया जाता है।
चरण 2: स्पीकर/चेयरमैन की अनुमति – तय करते हैं कि नोटिस स्वीकार किया जाए या नहीं। उनके मना करने पर मामला वहीं खत्म हो जाता है।
चरण 3 : जांच समिति (Inquiry Committee) – अगर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया, तो एक 3 सदस्यीय समिति बनाई जाती है। जिसमें तीन सदस्य होंगे – एक सुप्रीम कोर्ट के जज, एक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और एक प्रख्यात विधिवेत्ता। – यह तीन सदस्यीय समिति तय करती है कि दुराचार या अयोग्यता साबित होती है या नहीं।
चरण 4: रिपोर्ट संसद में – जांच के बाद अगर समिति कहती है कि आरोप सही हैं, तो संसद में हटाने का प्रस्ताव रखा जाता है।
चरण 5 : दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत – प्रस्ताव पर लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में 2/3 सदस्यों (मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों में) की सहमति जरूरी होती है
चरण 6: राष्ट्रपति द्वारा हटाया जाना – दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति उस जज को पद से हटा सकते हैं।
ये भी पढ़ें: जज के घर कैश मिलने का मामला: 100 से अधिक सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव पर किया हस्ताक्षर
महाभियोग और जजों पद से हटाने की प्रक्रिया में अंतर:
1. महाभियोग की प्रक्रिया पूरी तरह संसदीय होती है। जांच भी संसद करती है। जबकि ‘पद से हटाने’ की प्रक्रिया में तीन सदस्यीय जांच कमेटी का गठन होता है जो आरोपों की जांच करती है।
2. महाभियोग में राष्ट्रपति को संसद ही पद से हटा सकती है। जबकि ‘पद से हटाने’ की प्रक्रिया में संसद के दोनों सदनों से प्रस्ताव पास होने के बाद राष्ट्रपति पद से हटाते हैं।
जजों को पद से हटाने की प्रक्रिया भी महाभियोग की तरह कठिन है। जजों को पद से हटाने के कई प्रयास किए गए, लेकिन आजतक किसी भी जज को इस प्रकिया से हटाया नहीं जा सका है। जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले में मौजूदा सरकार की कोशिश है कि इस बार संसद में पक्ष विपक्ष में आम सहमति बनाकर जस्टिस वर्मा को पद से हटाया जाए।