पहला असफल महाभियोग
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस वी रामास्वामी का मामला भारत के न्यायिक इतिहास का पहला मामला है जब भ्रष्टाचार के आरोप में किसी जज को उसके पद से हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाया गया था। जस्टिस रामास्वामी के खिलाफ लोकसभा में 10 मई 1993 यह प्रस्ताव लाया गया था लेकिन आवश्यक समर्थन नहीं जुटा सका और 11 मई को प्रस्ताव गिर गया था।
जस्टिस वी रामास्वामी 1989 में सुप्रीम कोर्ट का जज बनने से पहले पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश थे। उन पर आरोप लगे कि हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश रहते हुए उन्होंने सरकारी धन का दुरुपयोग किया था। अकाउंटेंट जनरल ऑफ पंजाब एंड हरियाणा की रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ था कि जस्टिस रामास्वामी ने अपने बंगले की साज-सज्जा में सरकारी पैसे का दुरुपयोग किया था। अकाउंटेंट जनरल की इस रिपोर्ट पर इंदिरा जयसिंह की मैगज़ीन लॉयर्स कलेक्टिव में अप्रैल- मई 1990 में आर्टिकल छपा। उसके बाद तमाम अखबारों में उससे जुड़ी रिपोर्ट छपती रही। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने इस मुद्दे को लेकर प्रस्ताव पास किया कि जस्टिस रामास्वामी के खिलाफ़ महाभियोग लाना चाहिए। उस समय के प्रमुख कानूनी हस्तियों, जिनमें सोली सोराबजी, के परासरन, के के वेणुगोपाल और डॉ वाई एस चितले शामिल थे, ने जस्टिस रामास्वामी के खिलाफ कार्रवाई के लिए दबाव डाला।
साल 1990 की बात है। गर्मी की छुट्टियों के बाद 20 जुलाई को जब कोर्ट खुली, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सब्यसाची मुखर्जी ने एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट नंबर एक में भारी संख्या में मौजूद वकीलों और मुवक्किलों की मौजूदगी में अदालत को संबोधित किया। उन्होंने स्वीकार किया कि साथी जज जस्टिस वी रामास्वामी के खिलाफ गंभीर आरोप हैं। लेकिन ये भी स्पष्ट किया कि उनके पास एक बैठे न्यायाधीश की जांच करने का कानूनी अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि जस्टिस रामास्वामी को तबतक के लिए छुट्टी पर जाने के लिए बोल दिया गया है जबतक उनपर लगे आरोपों की इन-हाउस जांच नहीं हो जाती। जजों के ऊपर लगे आरोपों की जांच के लिए ‘इन हाउस’ प्रक्रिया की शुरुआत उसी समय से माना जाता है।
जस्टिस रामस्वामी छुट्टी पर चले गए। तत्कालीन सीजेआई जस्टिस सब्यसाची मुखर्जी ने आरोपों की जांच के लिए जस्टिस बी सी रे की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी का गठन कर दिया। कमेटी के दो अन्य सदस्य थे जस्टिस जगन्नाथ शेट्टी और जस्टिस वेंकटचलैया। जस्टिस रामस्वामी ने कमेटी के सामने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पंजाब एंड हरियाणा हाईकार्ट के कुछ जजों ने उनके खिलाफ षड्यंत्र किया है।
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अभी जांच चल ही रही थी कि 25 सितम्बर 1990 को सीजेआई जस्टिस सव्यसाची मुखर्जी की लंदन में हार्ट अटैक से निधन हो गया। जस्टिस रंगनाथ मिश्रा सीजेआई बने। रिटायरमेंट के बाद जस्टिस रंगनाथ मिश्रा राज्यसभा चले गए थे। सुप्रीम कोर्ट की इन हाउस कमेटी ने अपनी जांच रिपोर्ट में कहा कि जस्टिस रामास्वामी के ऊपर लगे आरोप साबित नहीं हुए। इस रिपोर्ट के बाद जस्टिस रामास्वामी सुप्रीम कोर्ट आना शुरू कर चुके थे।
लेकिन बात खत्म नहीं हुई। जस्टिस रामस्वामी को पद से हटाने का मुहिम चलाने वालों ने कोशिश जारी रखी। पूर्व कानून मंत्री और जाने माने वकील शांति भूषण अपनी किताब कोर्टिंग डेस्टिनी: अ मेमॉयर में लिखते हैं कि प्रशांत भूषण ने महाभियोग प्रस्ताव तैयार किया था। वीपी सिंह, सोमनाथ चटर्जी और लेफ्ट के कई सांसदों ने उस प्रस्ताव पर तत्काल हस्ताक्षर कर दिया था। लेकिन बीजेपी को इस प्रस्ताव को लेकर शुरू में कुछ आपत्तियां थीं। शांति भूषण ने लिखा है कि अटल बिहारी वाजपेयी की पहली प्रतिक्रिया थी कि जस्टिस रामास्वामी के खिलाफ लगे आरोप गंभीर नहीं हैं। मात्र कुछ लाख की खरीददारी का मामला है। उन्होंने कहा था ‘ऐसा लग रहा है कि हम एक जज को मुर्गी चुराने के छोटे अपराध के लिए, उसे पद से हटाना चाहते हैं।’ बाद में बीजेपी इस प्रस्ताव के पक्ष में आ गई थी।

27 फरवरी 1991 को बोलपुर से सीपीआई (एम) के तत्कालीन सांसद सोमनाथ चटर्जी की अगुवाई में लोकसभा के 108 सांसदों ने जस्टिस रामास्वामी को पद से हटाने के लिए तत्कालीन लोकसभा स्पीकर रवि राय के सामने प्रस्ताव पेश किया। स्पीकर ने जस्टिस पीबी सावंत की अगुवाई में तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया। कमेटी के दो अन्य सदस्य थे, जस्टिस पी डी देसाई ( बॉम्बे हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस) और सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस ओ चिनप्पा रेड्डी। कमेटी ने जस्टिस रामास्वामी को नोटिस भेजा, लेकिन उन्होंने कमेटी के सामने पेश होने से इंकार कर दिया था। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में माना कि जस्टिस रामास्वामी के ऊपर लगे आरोप सही थे।
लोकसभा में जस्टिस रामास्वामी को हटाने के प्रस्ताव पर बहस के लिए उन्होंने सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल को अपना वकील रखा था। सोमनाथ चटर्जी ने लोकसभा में प्रस्ताव पेश किया। उन्होंने कहा कि यह संवैधानिक दायित्व है, यह किसी जज का राजनीतिक उत्पीड़न नहीं। हम सुप्रीम कोर्ट की गरिमा बनाए रखना चाहते हैं। देश और दुनिया को यह बताना चाहिए कि यह सदन, यह संसद, संविधान के तहत अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर सकती है।
सोमनाथ चटर्जी ने प्रस्ताव के समर्थन में मतदान की अपील करते हुए कहा कि अगर हम आज विफल होते हैं, तो हम न केवल संविधान को बल्कि इस देश के लोगों की उम्मीदों को भी विफल कर देंगे, जो हमारे संस्थानों पर भरोसा करते हैं। मैं एक बार फिर अपने सभी साथी सदस्यों से अपील करता हूं कि समय आ गया है जब हमें कुछ मूल्यों और मानदंडों के लिए खड़ा होना चाहिए।
अगर हम आज विफल होते हैं, तो हम न केवल संविधान को बल्कि इस देश के लोगों की उम्मीदों को भी विफल कर देंगे, जो हमारे संस्थानों पर भरोसा करते हैं। मैं एक बार फिर अपने सभी साथी सदस्यों से अपील करता हूं कि समय आ गया है जब हमें कुछ मूल्यों और मानदंडों के लिए खड़ा होना चाहिए। – सोमनाथ चटर्जी
जस्टिस रामास्वामी की तरफ से पेश हो रहे एडवोकेट कपिल सिब्बल ने लगभग छह घंटे तक बहस की थी। प्रस्ताव पारित होने के लिए, संसद के दो-तिहाई सदस्यों को उपस्थित होना चाहिए और मतदान करना चाहिए और बहुमत से पारित होना चाहिए। शुरुआत में, कांग्रेस सदस्यों से कहा गया था कि वे अपनी अंतरात्मा की आवाज पर मतदान कर सकते हैं। लेकिन बाद में स्थिति बदल गई। कहते हैं तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव नहीं चाहते थे कि जस्टिस रामास्वामी के खिलाफ यह प्रस्ताव पास हो। इसलिए कांग्रेस के सांसद सदन में उपस्थित तो रहे, लेकिन उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई। प्रस्ताव के पक्ष में 196 सदस्यों ने मतदान किया और किसी ने भी इसके खिलाफ मतदान नहीं किया। तत्कालीन स्पीकर शिवराज पाटिल को घोषणा करना पड़ा कि प्रस्ताव पारित नहीं हुआ। सदन में दो-तिहाई सदस्य उपस्थित थे, लेकिन उनकी उपस्थिति दर्ज नहीं की गई ( सदन में 205 कांग्रेस सदस्य उपस्थित थे, उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई) और प्रस्ताव गिर गया।
कहते हैं कि जस्टिस वी रामास्वामी की टीम, लोकसभा के सदस्यों की छिपी हुई संकीर्ण क्षेत्रीय भावनाओं (parochial instincts) को भुनाने में सफल रही। उन्होंने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के मुद्दे को उत्तर बनाम दक्षिण का विवाद बना दिया और यह प्रचारित किया कि एक दक्षिण भारतीय जज को उत्तर भारतीय स्वार्थी तत्वों द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा है। इस मामले की जांच करने वाली समिति के अध्यक्ष रहे जस्टिस पी बी सावंत की टिप्पणी थी कि “जजों को हटाने की प्रणाली अव्यावहारिक, जटिल और पूरी तरह से राजनीतिज्ञों पर निर्भर है।”
“जजों को हटाने की प्रणाली अव्यावहारिक, जटिल और पूरी तरह से राजनीतिज्ञों पर निर्भर है।” – जस्टिस पी बी सावंत
लोकसभा में प्रस्ताव गिरने के बाद जस्टिस रामास्वामी ने अदालत आना शुरू कर दिया । उनका कार्यकाल 14 फ़रवरी, 1994 को समाप्त होने वाला था, यानी उनके कार्यकाल में अभी लगभग नौ महीने शेष थे। लेकिन तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वेंकटचलैया ने जस्टिस रामास्वामी को सुनवाई के लिए कोई भी मामला आवंटित नहीं किया। अंतिम कुछ महीनों में, जस्टिस रामास्वामी ने अपने कक्ष से ही कार्य किया, अपना पूरा वेतन लिया और सेवानिवृत्त हो गए।
शांति भूषण अपनी किताब कोर्टिंग डेस्टिनी: अ मेमॉयर में लिखते हैं कि “जस्टिस रामास्वामी ने मुख्य न्यायाधीश द्वारा उन्हें कोई भी न्यायिक कार्य सौंपने से इनकार करने का विरोध किया था। लेकिन जस्टिस वेंकटचलैया अपने निश्चय पर अडिग रहे और उस दिन से लेकर अपनी सेवानिवृत्ति की तिथि तक जस्टिस रामास्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में कदम नहीं रखा। वे अपना वेतन लेते रहे और कागज़ों पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बने रहे। 14 फ़रवरी 1994 को सेवानिवृत्त होने तक उन्होंने कोई न्यायिक कार्य नहीं किया। यह उनके निष्कासन की कार्यवाही का एक सकारात्मक प्रभाव था।”
जस्टिस वी रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही भारतीय न्यायिक और राजनीतिक इतिहास का एक ऐतिहासिक प्रकरण बन गई। इसने किसी जज को पद से हटाने की जटिलताओं को उजागर किया और न्यायपालिका तथा राजनीति के बीच के परस्पर संबंधों को उजागर। हालांकि यह प्रस्ताव विफल हो गया, लेकिन इसने न्यायिक जवाबदेही, जजों को हटाने की प्रक्रिया को स्पष्ट और व्यावहारिक बनाने की आवश्यकता तथा न्यायिक कार्यवाही में राजनीतिक प्रभाव की भूमिका पर देशव्यापी बहस को जन्म दिया।