दिल्ली हाईकोर्ट में विशेष नियुक्ति
दिल्ली हाईकोर्ट ने 2023 में पटियाला हाउस कोर्ट के जिला जज विमल कुमार यादव को हाईकोर्ट का जज बनाने की सिफारिश सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम से की थी। लेकिन तब तत्कालीन सीजेआई जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली कॉलेजियम ने उनके नाम पर अपनी मंजूरी नहीं दी थी। क्योंकि तब दिल्ली हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट आए जजों ने विमल यादव के बारे में नकारात्मक रिपोर्ट दी थी और वो हाईकोर्ट नहीं जा पाए थे। उस समय बताया गया था कि केंद्र ने विमल यादव की फ़ाइल कॉलेजियम को लौटा दी थी और उसे अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार करने का सुझाव दिया था। लेकिन उस समय भी आईबी ने विमल यादव के बारे कोई नकारात्मक रिपोर्ट नहीं दी थी।
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को आईबी रिपोर्ट और अन्य जानकारियों को पढ़ने के बाद लगा कि इस जज के साथ अन्याय हुआ है। कॉलेजियम ने विमल कुमार यादव के रिटायरमेंट के करीब डेढ़ साल बाद एक बार फिर उनको हाईकोर्ट का जज बनाने पर विचार किया है। इस बार सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की संरचना बदल चुकी है। जस्टिस चंद्रचूड़ के रिटायर होने के बाद कॉलेजियम की अध्यक्षता सीजेआई जस्टिस बीआर गवई कर रहे हैं। और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति की सिफारिश करने वाली तीन सदस्यीय कॉलेजियम के दो अन्य जज हैं जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रम नाथ। सीजेआई जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम ने विमल कुमार यादव को दिल्ली हाईकोर्ट का जज बनाने की सिफारिश सरकार को भेजी है। केंद्र सरकार अगर सिफारिश मान लेती है तो विमल कुमार यादव करीब 18 महीने हाईकोर्ट के जज के रूप में काम करेंगे।
विमल कुमार यादव 1992 में दिल्ली न्यायिक सेवा में शामिल हुए। 2003 में वे दिल्ली उच्चतर न्यायिक सेवा का हिस्सा बने। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एडिशनल रजिस्ट्रार जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है और दिल्ली में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश और अन्य वरिष्ठ न्यायिक पदों पर कार्य किया है। 2006 में उन्हें उच्च न्यायिक कैडर में पदोन्नत किया गया। उन्होंने नई दिल्ली के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश तथा नई दिल्ली जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष जैसे प्रशासनिक पदों पर भी कार्य किया है।
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा किसी रिटायर्ड जिला जज को हाईकोर्ट में जज नियुक्त करना बहुत ही दुर्लभ होता है।अप्रैल 2023 में ऐसा ही मामला सामने आया था, जब रूपेश चंद्र वार्ष्णेय को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का जज बनाया गया था। उस समय कॉलेजियम ने उचित अपेक्षा और चयन प्रक्रिया में देरी का हवाला देते हुए सही समय पर रूपेश चंद्र वार्ष्णेय की पदोन्नति नहीं होने दी थी। रूपेश चंद्र वार्ष्णेय ने दो साल तक हाईकोर्ट के जज के रूप में कार्य किया।
सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2018 में अपने फैसले में कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 217(2)(ए) के तहत सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया था कि अनुच्छेद 224 के तहत अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति दो वर्ष से कम अवधि के लिए की जा सकती है। अनुच्छेद 217 (2) हाईकोर्ट के जजों के रूप में नियुक्ति के लिए योग्यताओं निर्धारित करता है। अनुच्छेद 224 उच्च न्यायालयों में अतिरिक्त और कार्यवाहक न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है। इसके तहत, राष्ट्रपति बढ़े हुए कार्यभार या बकाया कार्य को पूरा करने के लिए अस्थायी अवधि (दो वर्ष से अधिक नहीं) के लिए विधिवत योग्य व्यक्तियों को अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त कर सकते हैं।