केरल हाईकोर्ट ने एक मामले के फैसले में कहा है कि किसी मां को उसकी कोई भी संतान इस बात को आधार बनाकर भरण-पोषण देने से इनकार नहीं कर सकती कि उनके और भी बच्चे हैं। हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपीलकर्ता बेटे की याचिका खारिज करते हुए कहा कि अन्य बच्चों की मौजूदगी एक माँ द्वारा अपने बेटे से भरण-पोषण की मांग करने की याचिका के खिलाफ कोई उचित और वैध बचाव नहीं है।
जस्टिस पी वी कुन्हीकृष्णन ने एक ऐसे बेटे की याचिका खारिज कर दी, जिसने फैमिली कोर्ट द्वारा 100 वर्षीय मां को सिर्फ 2000 रुपये के भरण-पोषण भत्ता देने के आदेश को चुनौती दी थी। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि प्रतिवादी यानी मां, अपने एक अन्य बेटे के साथ रह रही है और उसके और भी बच्चे हैं, जो उसका भरण-पोषण करने में सक्षम हैं।
केरल हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि
“धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के अंतर्गत एक माँ द्वारा अपने पुत्र के विरुद्ध भरण-पोषण के लिए दायर याचिका में, पुत्र यह तर्क नहीं दे सकता कि माँ की देखभाल के लिए अन्य संतानें भी हैं, इसलिए उसे भरण-पोषण देने की आवश्यकता नहीं है। भले ही अन्य संतानें माँ की देखभाल न कर रही हों या नकारात्मक रवैया अपना रही हों, फिर भी याचिकाकर्ता, जो कि निर्विवाद रूप से प्रथम प्रतिवादी (माँ) का पुत्र है, उस पर यह कर्तव्य है कि वह अपनी माँ की देखभाल करे। अन्यथा, वह मानव कहलाने योग्य नहीं है।”
जस्टिस पी वी कुन्हीकृष्णन ने बेटे के तर्क पर गहरा दुख जताते हुए कहा कि शर्म आनी चाहिए, 100 साल की एक बुजुर्ग औऱ लाचार मां को सिर्फ 2000 रुपये नहीं दे सकते। उन्होंने अपने आदेश में लिखा है, “भरण-पोषण भत्ता के लिए याचिका दायर करते समय याचिकाकर्ता की मां 92 वर्ष की थीं। अब वह 100 वर्ष की हो चुकी हैं और अपने बेटे से भरण-पोषण की उम्मीद कर रही हैं! मुझे यह कहते हुए शर्म आ रही है कि मैं इस समाज का सदस्य हूं, जहां एक बेटा अपनी 100 वर्षीय मां से सिर्फ 2,000 रुपये मासिक भरण-पोषण देने से इनकार करने के लिए अदालती लड़ाई लड़ रहा है!”
मुझे यह कहते हुए शर्म आ रही है कि मैं इस समाज का सदस्य हूं, जहां एक बेटा अपनी 100 वर्षीय मां से सिर्फ 2,000 रुपये मासिक भरण-पोषण देने से इनकार करने के लिए अदालती लड़ाई लड़ रहा है! – जस्टिस पी वी कुन्हीकृष्णन, जज, केरल हाईकोर्ट।
एक मामला ये भी था : मां बाप तो बुढ़ापे में ओल्ड एज होम में ही रहते हैं! मां बाप से बच्चे यही तो सीख रहे हैं!
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में भी आया था ऐसा मामला
इसी तरह के मामले में फरवरी में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक बेटे द्वारा 77 साल की मां को भरण-पोषण के आदेश के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया था। कोर्ट ने कहा था, कैसा कलयुग आ गया है जहां बेटा अपनी वृद्ध मां को गुजारा भत्ता देने से बचने के लिए कोर्ट आ गया। इस मामले में 77 साल की महिला के पति का स्वर्गवास करीब 32 साल पहले 1992 में हुआ था। उनके परिवार में एक बेटा और एक विवाहित बेटी है। उसके दो बेटे थे, हालांकि दूसरे की भी बाद में मृत्यु हो गई थी। पति की मृत्यु के बाद, महिला की 50 बीघे ज़मीन उसके बेटे और उसके मृत बेटे के बेटों को ट्रांसफर हो गई थी। मां के अतीत, वर्तमान और भविष्य के रखरखाव के लिए 1993 में 1 लाख रुपए की राशि दी गई थी। इसके बाद वो अपनी बेटी के साथ रहने लगीं। फैमिली कोर्ट ने मां को 5,000 रुपए गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए, बड़े बेटे ने तर्क दिया कि चूंकि मां उसके साथ नहीं रह रही थीं, ऐसे में पारिवारिक अदालत मेंटिनेंस का आदेश पारित नहीं कर सकती थी।
पंजाब एंड हरियाणा हाईकार्ट के जज जस्टिस जसगुरप्रीत सिंह पुरी ने अपने फैसले में लिखा था कि “यह याचिका कलयुग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है और इस मामले ने कोर्ट अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। फैमिली कोर्ट के द्वारा पारित आदेश में कुछ भी अवैध नहीं था। 5,000/-रुपये की राशि भी कोई ज्यादा नहीं थी। आप पिता की प्रॉपर्टी ले चुके हैं और फिर भी 5000 रुपये के लिए हाईकोर्ट चले आए..।”