हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट : आमने सामने / फ़ोटो - विकिपीडिया
इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज जस्टिस प्रशांत कुमार के एक फैसले में खामी पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि उनके पास मौजूद आपराधिक मामले (क्रिमिनल केस) तुरंत वापस लिया जाए। क्योंकि वो क्रिमिनल मामलों की सुनवाई के योग्य नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से नाराज़ इलाहाबाद हाईकोर्ट के जजों ने, हाइकोर्ट के चीफ जस्टिस से मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर अमल नहीं होना चाहिए।
न्यायपालिका से जुड़ा नया विवाद : हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट आमने- सामने!
इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज जस्टिस प्रशांत कुमार के एक फैसले में खामी पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि उनके पास मौजूद आपराधिक मामले (क्रिमिनल केस) तुरंत वापस लिया जाए। क्योंकि वो क्रिमिनल मामलों की… pic.twitter.com/bltUsTRP70— Prabhakar Kumar Mishra (@PMishra_Journo) August 7, 2025
इलाहाबाद हाईकोर्ट के 13 जजों ने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, जस्टिस अरुण भंसाली को लिखा है। हाईकोर्ट के जजों ने चीफ जस्टिस से तत्काल फुलकोर्ट मीटिंग बुलाने की मांग की है। चीफ जस्टिस को लिखे पत्र में कहा गया है कि फुलकोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के आदेश में व्यक्त किए गए भाव के प्रति विरोध दर्ज कराया जाना चाहिए।
पत्र में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट का हाईकोर्ट पर कोई प्रशासनिक अधिकारिता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नाराज़गी जताते हुए कहा गया है कि हाईकोर्ट के जिस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने दोषपूर्ण बताया है, जस्टिस प्रशांत कुमार ने उसे लिखने के लिए सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों का आधार लिया है। ऐसे में ये कहना कि जस्टिस प्रशांत कुमार का आदेश अत्यंत दोषपूर्ण है, यह निराधार एक आरोप है।
मामले की पृष्ठभूमि
सुप्रीम कोर्ट ने 4 अगस्त को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार के फैसले पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए कहा था कि जज आपराधिक मामलों की सुनवाई के योग्य नहीं हैं। हाईकोर्ट के जज जस्टिस प्रशांत कुमार ने यह कहते हुए एक क्रिमिनल कंप्लेंट को रद्द करने से इनकार कर दिया था कि बकाया राशि की वसूली के लिए दीवानी मुकदमे का उपाय प्रभावी नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच एक विशेष अनुमति याचिका SLP)पर सुनवाई कर रही थी, जो इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस प्रशांत कुमार के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी। इसमें अपीलकर्ता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 406 के तहत जारी समन को रद्द करने की मांग थी।
ललिता टेक्सटाइल्स (शिकायतकर्ता ) ने आरोप लगाया कि उसने निर्माण में इस्तेमाल होने वाला धागा सप्लाई किया, जिसका 7 लाख 23 हजार 7 सौ ग्यारह रुपया अपीलकर्ता पर बकाया है। शिकायत दर्ज होने के बाद, उत्तरदाता/शिकायतकर्ता का बयान दर्ज हुआ और अपीलकर्ता को समन जारी हुआ।अपीलकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया। लेकिन जस्टिस कुमार ने कहा कि चूंकि शिकायतकर्ता छोटा व्यापारी है और राशि बड़ी है, इसलिए इसे केवल दीवानी विवाद मानना न्याय का मजाक होगा।
जस्टिस प्रशांत कुमार ने अपने आदेश में लिखा कि चूंकि
शिकायतकर्ता बहुत छोटा व्यापारी है और उसके लिए यह राशि और ब्याज काफी बड़ी है। अगर उसे दीवानी वाद दायर करना पड़ा, तो इसे निपटने में सालों लगेंगे और उसे और पैसा खर्च करना पड़ेगा। सीधा कहें तो यह अच्छे पैसे के पीछे बुरे पैसे फेंकने जैसा होगा। अगर इस मामले को दीवानी अदालत भेजा गया तो यह न्याय का उपहास होगा और शिकायतकर्ता को अपूरणीय क्षति होगी।
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मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला ने हाईकोर्ट के पैरा 12 का हवाला देते हुए कहा : “जज ने यहां तक कह दिया कि बकाया राशि की वसूली के लिए शिकायतकर्ता को दीवानी ( सिविल);उपाय अपनाने को कहना अनुचित होगा, क्योंकि इसमें समय लगेगा। इसलिए उसे आपराधिक कार्यवाही करने की अनुमति दी जानी चाहिए। जज की ऐसी कानूनी समझ कि आपराधिक मुकदमे से बकाया राशि दिला दी जाएगी, चौंकाने वाली है।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हमारे पास हाईकोर्ट का आदेश रद्द करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। कोर्ट ने शिकायतकर्ता को बिना नोटिस दिए ही हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और मामले को दोबारा सुनवाई के लिए हाईकोर्ट के दूसरे जज को भेज दिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज, सुप्रीम कोर्ट के इसी आदेश से आहत और नाराज़ हैं। और नहीं चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का अमल करते हुए जस्टिस प्रशांत कुमार को क्रिमिनल केस के रोस्टर से अलग किया जाए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ किसी हाईकोर्ट के जजों का एकजुट होना, न्यायपालिका के इतिहास में अभूतपूर्व घटना है।