सियासत ने माई लॉर्ड्स को भी बाँट दिया!
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के रिटायर्ड जजों और कुछ सीनियर एडवोकेट्स ने ज्वाइंट स्टेटमेंट जारी कर सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज और विपक्ष समर्थित उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जस्टिस एस सुदर्शन रेड्डी को लेकर गृहमंत्री अमित शाह के बयान की निंदा की है। अमित शाह ने कहा था जस्टिस एस सुदर्शन रेड्डी नक्सलवाद के समर्थक रहे हैं। उन्होंने 2011 के अपने फैसले में यदि सलवा जुडूम को असंवैधानिक नहीं घोषित किया होता तो … 2020 तक देश से नक्सलवाद का खात्मा हो गया होता!
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के रिटायर्ड जजों और कुछ सीनियर एडवोकेट्स ने ज्वाइंट स्टेटमेंट जारी कर सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज और विपक्ष समर्थित उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जस्टिस एस सुदर्शन रेड्डी को को लेकर गृहमंत्री अमित शाह के बयान की निंदा की है।
अमित शाह ने कहा था जस्टिस… pic.twitter.com/YTeei1qwOs
— Prabhakar Kumar Mishra (@PMishra_Journo) August 25, 2025
रिटायर्ड जजों और सीनियर एडवोकेट्स ने अपने संयुक्त रूप से जारी स्टेटमेंट में कहा है कि “केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह द्वारा सुप्रीम कोर्ट के सलवा जुडूम मामले के निर्णय की सार्वजनिक रूप से की गई गलत व्याख्या दुर्भाग्यपूर्ण है। इस निर्णय में कहीं भी प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत नहीं मिलता कि कोर्ट ने नक्सलवाद या उसकी विचारधारा का समर्थन किया है। भारत के उपराष्ट्रपति पद के चुनाव का अभियान भले ही वैचारिक हो सकता है, लेकिन इसे सभ्यता और गरिमा के साथ संचालित किया जा सकता है। किसी भी प्रत्याशी की तथाकथित विचारधारा की आलोचना से बचना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की इस प्रकार की पक्षपातपूर्ण और गलत व्याख्या, जब किसी उच्च राजनीतिक पदाधिकारी द्वारा की जाती है, तो यह सुप्रीम कोर्ट के जजों पर भयप्रद प्रभाव डाल सकती है और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है। भारत के उपराष्ट्रपति के पद की गरिमा का ख्याल रखते हुए उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का इस तरह नाम लेकर आलोचना करने से बचना चाहिए।”
बयान जारी करने वाले जजों में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज, जस्टिस अभय ओके, जस्टिस ए के पटनायक, जस्टिस गोपाल गौडा, जस्टिस विक्रमाजीत सेन, जस्टिस कुरियन जोसफ, जस्टिस मदन बी लोकुर, जस्टिस जे चलमेश्वर शामिल हैं। हाईकोर्ट के रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीशों में जस्टिस गोविन्द माथुर, जस्टिस एस मुरलीधर, जस्टिस संजीब बनर्जी और हाईकोर्ट के जजों में जस्टिस अंजना प्रकाश, जस्टिस सी प्रवीण कुमार, जस्टिस ए गोपाल रेड्डी, जस्टिस जी रघुराम, जस्टिस के कन्नन, जस्टिस के चंद्रू , जस्टिस बी चंद्रकुमार, जस्टिस कैलाश गंभीर शामिल हैं। इनके अलावा नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी बेंगलुरू के पूर्व निदेशक प्रोफेसर मोहन गोपाल और सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े का नाम भी स्टेटमेंट जारी करने वालों में शामिल है।
जस्टिस सुदर्शन रेड्डी ने अमित शाह के आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि यह सलवा जुडूम वाला फैसला उनका निजी फैसला नहीं था, यह सुप्रीम कोर्ट का सामूहिक फैसला था। उन्होंने कहा कि गृहमंत्री ने वह यदि 40 पन्नों का वह फैसला पढ़ा होता, तो शायद वह ऐसा बयान नहीं देते।
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फरवरी 2011 में, सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ में सरकार समर्थित संगठन सलवा जुडूम को असंवैधानिक करार दिया था। वह फैसला जस्टिस बी सुदर्शन रेड्डी और जस्टिस एस एस निज्जर की बेंच ने ही सुनाया था। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि ” सलवा जुडूम का गठन राज्य की संवैधानिक ज़िम्मेदारियों से पलायन था। यह राज्य की ज़िम्मेदारी थी कि नागरिकों को उपयुक्त सुरक्षा प्रदान की जाए। इसके लिए पर्याप्त संख्या में, प्रशिक्षित, पेशेवर और स्थायी रूप से सुसज्जित पुलिस बल होना चाहिए। कोर्ट ने अपने फैसले में आगे लिखा था कि“राज्य के पास ही हिंसा के प्रयोग का विशेषाधिकार है… केवल राज्य ही इस शक्ति का प्रयोग कर सकता है। इसे किसी लक्षित समूह के ख़िलाफ़ किसी और माध्यम के ज़रिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता… राज्य अपनी शक्ति को आउटसोर्स नहीं कर सकता।”
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