सोमवार को कुछ सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज और कुछ हाईकोर्ट के जजों ने विपक्ष समर्थित उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जस्टिस बी सुदर्शन रेड्डी के पक्ष में स्टेटमेंट जारी कर गृहमंत्री अमित शाह के बयान की निंदा की थी। जिसमें गृहमंत्री ने कहा था कि जस्टिस बी सुदर्शन रेड्डी नक्सलवाद के समर्थक रहे हैं। उन्होंने 2011 के अपने फैसले में यदि सलवा जुडूम को असंवैधानिक नहीं घोषित किया होता तो … 2020 तक देश से नक्सलवाद का खात्मा हो गया होता!
उस स्टेटमेंट के विरोध में एक स्टेटमेंट जारी हुआ है। इसमें उस स्टेटमेंट की आलोचना करते हुए कहा गया है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता किसी राजनीतिक उम्मीदवार ( जस्टिस रेड्डी) की आलोचना से ख़तरे में नहीं पड़ती। न्यायपालिका की साख तब धूमिल होती है जब रिटायर्ड जज बार बार किसी के पक्ष में स्टेटमेंट जारी करते हैं। जिससे यह संदेश जाता है कि न्यायपालिका भी राजनीतिक लड़ाइयों में शामिल हैं। इन तरीक़ों के कारण, कुछ लोगों की ग़लती से, संपूर्ण न्यायाधीश समुदाय को पक्षपाती गिरोह के रूप में देखा जाने लगता है। यह न तो भारत की न्यायपालिका के लिए उचित है और न ही लोकतंत्र के लिए स्वस्थ। … इस स्टेटमेंट में कहा गया है कि हम अपने साथी जजों से प्रबल आग्रह करते हैं कि वे अपने नाम को राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित बयानों से दूर रखें। जिन्होंने राजनीति का मार्ग चुना है, उन्हें उसी क्षेत्र में अपना बचाव करना चाहिए। न्यायपालिका की संस्था को इन उलझनों से ऊपर और अलग रखा जाना अनिवार्य है।
कुछ सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज और कुछ हाईकोर्ट के जजों ने विपक्ष समर्थित उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जस्टिस बी सुदर्शन रेड्डी के पक्ष में स्टेटमेंट जारी कर गृहमंत्री अमित शाह के बयान की निंदा की थी। स्टेटमेंट जारी करने वालों की संख्या 20 थी।
जवाब में एक और स्टेटमेंट जारी हुआ… https://t.co/s8Cx2UKGgy
— Prabhakar Kumar Mishra (@PMishra_Journo) August 26, 2025
बयान जारी करने वालों में पूर्व सीजेआई जस्टिस पी सदाशिवम, पूर्व सीजेआई जस्टिस रंजन गोगोई, सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस एम आर शाह, सहित हाइकोर्ट्स के 56 रिटायर्ड चीफ जस्टिस और जजों के नाम शामिल हैं।
संबंधित ख़बर यहाँ पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के रिटायर्ड जजों ने जज के नक्सली होने के गृहमंत्री के बयान की निंदा की है !
जस्टिस सुदर्शन रेड्डी के समर्थन में जारी बयान में सुप्रीम कोर्टी और हाईकोर्ट के कुछ रिटायर्ड जजों ने संयुक्त रूप से जारी स्टेटमेंट में कहा था कि “केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह द्वारा सुप्रीम कोर्ट के सलवा जुडूम मामले के निर्णय की सार्वजनिक रूप से की गई गलत व्याख्या दुर्भाग्यपूर्ण है। इस निर्णय में कहीं भी प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत नहीं मिलता कि कोर्ट ने नक्सलवाद या उसकी विचारधारा का समर्थन किया है। भारत के उपराष्ट्रपति पद के चुनाव का अभियान भले ही वैचारिक हो सकता है, लेकिन इसे सभ्यता और गरिमा के साथ संचालित किया जा सकता है। किसी भी प्रत्याशी की तथाकथित विचारधारा की आलोचना से बचना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की इस प्रकार की पक्षपातपूर्ण और गलत व्याख्या, जब किसी उच्च राजनीतिक पदाधिकारी द्वारा की जाती है, तो यह सुप्रीम कोर्ट के जजों पर भयप्रद प्रभाव डाल सकती है और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है। भारत के उपराष्ट्रपति के पद की गरिमा का ख्याल रखते हुए उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का इस तरह नाम लेकर आलोचना करने से बचना चाहिए।”