हाल के दिनों में शादी का झांसा देकर यौन संबंध बनाने के आरोपों और इस तरह के झूठे मुकदमों से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट्स के लिए दिशा निर्देश जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दिए अपने फैसले में कहा है कि रेप और सहमति से रेप के बीच स्पष्ट अंतर है। कोर्ट ने यह भी माना कि अदालतों को शादी का वादा करके यौन संबंध बनाने के आरोपों का बेहद सावधानी से आकलन करना चाहिए। यदि आरोपी की शादी करने की कभी मंशा ही नहीं थी और उसने केवल यौन संबंध बनाने के लिए झूठा वादा किया, तभी यह धोखाधड़ी या छल के दायरे में आएगा।
जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने रेप से जुड़े मामले में आपराधिक कार्यवाही रद्द करते हुए कहा कि झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतें न केवल किसी व्यक्ति की छवि खराब करती हैं बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग भी है। कोर्ट ने कहा कि “यह अब तक अच्छी तरह स्थापित हो चुका है कि किसी व्यक्ति को तुच्छ या दुर्भावनापूर्ण शिकायत के आधार पर सम्मन करना बेहद गंभीर मामला है। इससे उस व्यक्ति की छवि धूमिल होती है, जिसके खिलाफ झूठे और दुर्भावनापूर्ण आरोप लगाए जाते हैं।”
“यह अब तक अच्छी तरह स्थापित हो चुका है कि किसी व्यक्ति को तुच्छ या दुर्भावनापूर्ण शिकायत के आधार पर सम्मन करना बेहद गंभीर मामला है। इससे उस व्यक्ति की छवि धूमिल होती है, जिसके खिलाफ झूठे और दुर्भावनापूर्ण आरोप लगाए जाते हैं।” – सुप्रीम कोर्ट ।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट्स में सीआरपीसी की धारा 482 (अब बीएनएस की धारा 528) के तहत दायर याचिकाओं, जिसमें हाईकोर्ट से मामला रद्द करने की मांग की जाती है, पर विचार करने के लिए चार-स्तरीय दिशानिर्देश जारी किया है:
1. कोर्ट यह सुनिश्चित करे कि आरोपी द्वारा पेश की गई सामग्री पूरी तरह भरोसेमंद और संदेह से परे है।
2. कोर्ट यह आकलन करे कि यदि उस सामग्री को स्वीकार किया जाए तो क्या वह आरोपों को ख़ारिज करने में मदद कर सकता है।
3. कोर्ट यह भी देखेगा कि आरोपी द्वारा पेश की गई सामग्री या सबूत को अभियोजन या शिकायतकर्ता ने गलत साबित किया है! और अंत में,
4. हाई कोर्ट यह तय करेगा कि क्या कार्यवाही को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और न्याय के उद्देश्यों को विफल करेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि इन सभी सवालों का जवाब “हाँ” में है, तो हाइकोर्ट्स को अपनी न्यायिक अंतरात्मा की आवाज पर ऐसे आपराधिक मामलों को रद्द कर देना चाहिए। यह फैसला भविष्य में झूठे और बहुत देरी से दर्ज होने वाले मामलों पर लगाम लगाने में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2019 के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर आया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2014 में दर्ज एक महिला की शिकायत पर शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इंकार कर दिया था। महिला ने आरोप लगाया था कि 2010 में आरोपी ने उसके साथ बलात्कार, अप्राकृतिक यौन संबंध, मारपीट और जातीय उत्पीड़न किया था। यह शिकायत चार साल बाद दर्ज कराई गई थी और उसमें आरोपी के माता-पिता को भी घसीटा गया था। मजिस्ट्रेट ने आईपीसी की धारा 376 (बलात्कार) के तहत आरोपी को समन जारी किया था, जिसे हाईकोर्ट ने बरकरार रखा।
आरोपी की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दलील दी गई कि वह और शिकायतकर्ता कंसेंशुअल रिलेशन में थे, जो बाद में बिगड़ गया।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि शिकायत विश्वसनीय नहीं लगती और उसमें घटना की तारीख और स्थान जैसी बुनियादी जानकारी भी नहीं थी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि शिकायत दर्ज करने में चार साल की देरी का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि न केवल अपीलकर्ता को आपराधिक कार्यवाही में घसीटा गया, बल्कि उसके माता-पिता को भी आरोपी बना दिया गया। साथ ही कई अन्य मामले भी दर्ज कर दिए गए। इससे पूरा मामला संदिग्ध हो जाता है।
आरोपी के खिलाफ आरोपों को निराधार मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उसकी अपील स्वीकार कर ली, हाई कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया और इलाहाबाद मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।