आपका आचरण अविश्वास पैदा करता है : सुप्रीम कोर्ट
जज के घर मिले कैश कांड में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज, जस्टिस यशवंत वर्मा ने उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया के तहत लोकसभा स्पीकर की ओर से गठित कमेटी को सुप्रीम कोर्ट चुनौती में दी है। जस्टिस वर्मा की दलील है कि जब 21 जुलाई को लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही सदनों में उनको पद से हटाने का प्रस्ताव पेश किया गया था तो ऐसी स्थिति में जजेज इन्क्वारी एक्ट के तहत जब तक दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया जाता, तब तक कोई कमेटी का गठन नहीं हो सकता। दोनों सदनों से प्रस्ताव पास होने पर ही स्पीकर और राज्यसभा चेयरमैन की ओर से संयुक्त कमेटी का गठन होना चाहिए था। लेकिन लोकसभा स्पीकर ने राज्यसभा में प्रस्ताव पर कोई फैसला हुए बगैर अपनी ओर से कमेटी का गठन कर दिया। स्पीकर का फैसला ग़लत है। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा की याचिका पर लोकसभा और राज्यसभा सचिवालय को नोटिस जारी किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को जस्टिस यशवंत वर्मा द्वारा उनके खिलाफ शुरू की गई महाभियोग (इम्पीचमेंट) प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर लोकसभा अध्यक्ष और संसद के दोनों सदनों लोकसभा व राज्यसभा के सचिवालयों को नोटिस जारी किया। जस्टिस वर्मा ने अपनी याचिका में जजेस (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत प्रक्रिया के उल्लंघन का आरोप लगाया है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने सुनवाई के दौरान प्रथम दृष्टया इस बात पर सवाल उठाया कि महाभियोग की प्रक्रिया जिस तरह शुरू की गई, वह कानून के अनुरूप कैसे है। पीठ ने इस पर भी आश्चर्य जताया कि संसद के इतने सदस्य और कानूनी विशेषज्ञ होने के बावजूद इस कथित प्रक्रिया संबंधी खामी की ओर किसी ने ध्यान क्यों नहीं दिलाया।
“इतने सांसद और कानूनी विशेषज्ञ हैं, फिर भी किसी ने यह बात नहीं उठाई?” – जस्टिस दीपांकर दत्ता।
सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष के साथ-साथ लोकसभा और राज्यसभा सचिवालयों को नोटिस जारी करते हुए संकेत दिया कि इस मामले की अगली सुनवाई जनवरी के पहले सप्ताह में हो सकती है।
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जस्टिस यशवंत वर्मा ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा 12 अगस्त 2025 को तीन सदस्यीय जांच समिति के गठन को चुनौती दी है। उनका कहना है कि अध्यक्ष ने उसी दिन राज्यसभा के सभापति के समक्ष पेश की गई समान महाभियोग प्रस्ताव के स्वीकार किए जाने की प्रतीक्षा किए बिना एकतरफा कार्रवाई की। याचिका में कहा गया है कि जब लोकसभा और राज्यसभा दोनों में एक ही दिन महाभियोग प्रस्ताव दिए गए हों, तो जजेस (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968 की धारा 3(2) के प्रावधान के अनुसार कोई भी सदन अकेले समिति गठित नहीं कर सकता। कानून के मुताबिक, ऐसी स्थिति में दोनों सदनों द्वारा प्रस्ताव स्वीकार किए जाने के बाद ही समिति का गठन किया जा सकता है, और वह भी लोकसभा अध्यक्ष व राज्यसभा के सभापति द्वारा संयुक्त रूप से। जजेज (इन्क्वायरी) एक्ट की धारा 3(2) के प्रावधान में स्पष्ट रूप से कहा गया है:
“यदि संसद के दोनों सदनों में एक ही दिन ऐसे प्रस्तावों की सूचना दी जाती है, तो तब तक कोई समिति गठित नहीं की जाएगी जब तक दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार न हो जाएं, और यदि दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार हो जाते हैं, तो समिति का गठन अध्यक्ष और सभापति द्वारा संयुक्त रूप से किया जाएगा।”
महाभियोग की यह प्रक्रिया 14 मार्च की उस घटना से जुड़ी है, जब दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग लग गई थी। दमकल कर्मियों द्वारा मौके से कथित तौर पर बेहिसाब नकदी मिलने का दावा किया गया था, जिसके वीडियो बाद में सामने आए, जिनमें आग में जलते हुए नोटों के बंडल दिखे। उस समय जस्टिस वर्मा और उनकी पत्नी मध्य प्रदेश में यात्रा पर थे, जबकि घर में उनकी बेटी और बुजुर्ग मां मौजूद थीं। जस्टिस वर्मा ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि उन्हें झूठे तरीके से फंसाया जा रहा है।
इस घटना के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (अब सेवानिवृत्त) जस्टिस संजीव खन्ना ने तीन हाईकोर्ट जजों की एक इन-हाउस समिति गठित की थी, जिसने 4 मई को अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए जस्टिस वर्मा को दोषी ठहराया। इसके बाद उन्हें इस्तीफा देने का विकल्प दिया गया, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। फिर रिपोर्ट और उनका जवाब राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजा गया, जिसके आधार पर संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाए गए। लोकसभा में 146 सांसदों के हस्ताक्षर वाला प्रस्ताव स्वीकार किए जाने के बाद, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सुप्रीम कोर्ट के जज अरविंद कुमार, मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मणिंदर मोहन श्रीवास्तव और वरिष्ठ अधिवक्ता बी. वासुदेव आचार्य को शामिल करते हुए तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया। समिति ने जस्टिस वर्मा से जवाब मांगा, लेकिन उन्होंने दोनों सदनों में स्वीकार किए गए प्रस्तावों और उससे जुड़े आदेशों की प्रमाणित प्रतियां मांगीं। उनका दावा है कि इस पर कोई जवाब नहीं मिला, जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
फिलहाल, जांच समिति के समक्ष जवाब दाखिल करने की समय-सीमा 12 जनवरी तक बढ़ा दी गई है, जबकि 24 जनवरी को जस्टिस वर्मा की व्यक्तिगत उपस्थिति तय की गई है।