इस्तीफ़ा के बाद क्या ?
हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर कैश मिलने से जुड़े मामले में संसद के द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट लोकसभा में पेश कर कर दी है। जांच समिति ने जस्टिस वर्मा के ऊपर लगे आरोपों को सिद्ध पाया है। रिपोर्ट में नकदी, साक्ष्यों से छेड़छाड़ और उनके स्पष्टीकरण को लेकर गंभीर निष्कर्ष दर्ज किए गए है।
अब आगे क्या
संवधान में दी गई व्यवस्था के मुताबिक, हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज के खिलाफ़ जांच रिपोर्ट आने के बाद संसद के दोनों सदनों से जज को हटाने का प्रस्ताव पास कराना होता है। यह प्रस्ताव विशेष बहुमत से पास होना चाहिए। प्रस्ताव पास होने के बाद उसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। और राष्ट्रपति के यहाँ से उस जज को पद से हटाने का आदेश जारी हो जाता है।
लेकिन जस्टिस वर्मा तो पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं! ऐसे में अब क्या होगा ? जस्टिस वर्मा ने 9 अप्रैल 2026 को राष्ट्रपति को तत्काल प्रभाव से इस्तीफा भेज दिया था। यही इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पेचीदगी है।
इस्तीफे के लिए राष्ट्रपति के मंजूरी की कोई शर्त नहीं!
संविधान का आर्टिकल Article 217(1)(a) कहता है कि हाई कोर्ट का जज अपने हस्ताक्षर से राष्ट्रपति को संबोधित लिखित पत्र द्वारा इस्तीफा दे सकता है। संविधान इसमें राष्ट्रपति द्वारा इस्तीफे को स्वीकार करने ( acceptance ) की कोई शर्त नहीं लगाता। इस व्यवस्था के मुताबिक, अब जस्टिस वर्मा को पद से हटाने के लिए संसद में प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की जरूरत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने 1978 में Union of India v. Gopal Chandra Misra से जुड़े अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि हाईकोर्ट जज का इस्तीफा राष्ट्रपति की औपचारिक स्वीकृति पर निर्भर नहीं है। राष्ट्रपति को इस्तीफा विधिवत संबोधित और communicated होते ही यह एक प्रभावी, एकतरफा संवैधानिक कृत्य बन जाता है।
क्या इस्तीफे के बाद भी संसद जज को पद से हटाने की प्रक्रिया चला सकती है !
यह एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल है कि जब जज इस्तीफा दे चुका है, तो क्या संसद अब भी उसे महाभियोग के जरिए हटा सकती है?
सबसे पहले हमें यह जानना जरूरी है कि जजों को हटाने की प्रक्रिया Removal कही जाती है। सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए आर्टिकल 124(4) और हाईकोर्ट के जजों के लिए आर्टिकल 218 में रिमूवल की व्यवस्था दी गई है। दोनों मामलों में एक ही प्रक्रिया अपनाई जाती है। जजों को हटाने, पूरी जांच और संसदीय प्रक्रिया Judges (Inquiry) Act, 1968 के तहत चलती है।
यह महाभियोग (impeachment) नहीं होता। आम बोलचाल की भाषा में इसे जज का महाभियोग (impeachment) कहा जाता है, लेकिन संविधान में तकनीकी रूप से इसे removal यानी पद से हटाना कहा गया है। महाभियोग की प्रकिया रिमूवल से अलग होती है।
जजों को removal की प्रकिया से हटाया जाता है। रिमूवल और महाभियोग में अंतर समझिए
जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले में आज का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि जब उन्होंने पहले ही अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था तब भी क्या अब संसद में रिमूवल की कार्रवाई हो सकती है और अगर होती है तो उसका क्या प्रभाव होगा ?
रिमूवल का उद्देश्य किसी मौजूदा जज को उसके पद से हटाना है। अगर व्यक्ति पहले ही पद छोड़ चुका है, तो उसे उसी पद से हटाने का सवाल तकनीकी रूप से समाप्त हो जाता है।
Judges (Inquiry) Act की Section 6 भी उस स्थिति की कल्पना करती है जिसमें जांच समिति दोष सिद्ध करती है और उसके बाद संसद में लंबित रिमूवल प्रस्ताव पर विचार किया जाता है। इसीलिए जस्टिस वर्मा के मामले में एक मत यह है कि इस्तीफे के बाद रिमूवल proceedings infructuous हो जाती है।
लेकिन दूसरी तरफ एक महत्वपूर्ण तर्क यह भी हो सकता है कि जांच पूरी हो चुकी है और संसद के सामने रिपोर्ट आ चुकी है, इसलिए संसद कम-से-कम इस रिपोर्ट पर विचार कर सकती है।
यह लोकसभा स्पीकर पर निर्भर करता है, वो चाहें तो प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकते हैं।
रिमूवल के प्रभाव की बात करें तो यह जज के प्रतिष्ठा पर असर करेगा। जस्टिस यशवंत वर्मा के लिए रिकॉर्ड में ‘removed from the post’ लिखा जाएगा। उनके पोस्ट रिटायरमेंट बेनिफिट्स पर भी असर हो सकता है। यही नहीं हाईकोर्ट के जज अलग अलग ट्रिब्यूनल, आयोग में नियुक्त होते हैं, जस्टिस वर्मा अगर रिमूव किए जाते हैं तो ट्रिब्यूनल, अयोग का रास्ता बंद हो जाएगा।
यही नहीं, रिमूवल के बाद क्रिमिनल केस भी दर्ज हो सकता है।
अगर संसद उन्हें हटाती है, तो इसका अर्थ यह नहीं होगा कि उन्हें आपराधिक मामले में दोषी ठहरा दिया गया। यह एक संवैधानिक/संसदीय कार्रवाई है।
अगर कथित नकदी या किसी अन्य आचरण से संबंधित कोई अपराध बनता है, तो उसके लिए अलग से आपराधिक जांच और मुकदमा चल सकता है।
पहले भी ऐसी स्थिति आ चुकी है!
1. जस्टिस वर्मा का मामला पहली बार नहीं है जब किसी जज ने removal proceedings के बीच इस्तीफा दिया हो। सिक्किम हाईकोर्ट के जज जस्टिस पी डी दिनाकरन के ख़िलाफ़ 2011 में न्यायिक व्यभिचार (judicial misconduct) के आरोपों की जांच चल रही थी। उसी दौरान उन्होंने इस्तीफा दे दिया और संसद की रिमूवल प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
2. कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन के मामले में भी ऐसी ही स्थिति बनी थी। 2011 में उनपर वित्तीय अनियमितताओं का आरोप लगा। आरोपों पर संसदीय प्रक्रिया आगे बढ़ी। राज्यसभा ने 18 अगस्त 2011 को रिमूवल प्रस्ताव पारित भी कर दिया।
लेकिन लोकसभा में मतदान से ठीक पहले, 1 सितंबर 2011 को जस्टिस सौमित्र सेन ने इस्तीफा दे दिया। लोकसभा में उनके खिलाफ रिमूवल के प्रस्ताव पर मतदान ही नहीं हुआ। रिमूवल की प्रकिया बीच में ही रोक दी गई थी। जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले की तुलना सौमित्र सेन से करें तो यह मामला बहुत करीब है।
3. जस्टिस वी रामास्वामी के खिलाफ भारत में पहली बार संसद में जज को हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। जांच समिति ने उनके खिलाफ कई आरोपों को सही पाया। लेकिन 1993 में लोकसभा में रिमूवल मोशन आवश्यक विशेष बहुमत हासिल नहीं कर सका। प्रस्ताव के पक्ष में 196 वोट पड़े, लेकिन बड़ी संख्या में सांसद मतदान से अनुपस्थित थे जिससे प्रस्ताव विफल हो गया गया था।
यह तथ्य है कि आज तक सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के किसी जज को इस संवैधानिक रिमूवल प्रक्रिया के जरिए पद से हटाया नहीं गया है।