दो महीने में जमानत पर फैसला करो : SC
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट और निचली अदालतों के लिए जमानत याचिकाओं पर निपटारे के लिए समय सीमा तय कर दी है। कोर्ट ने अपने इस अहम फैसले में कहा है कि जमानत याचिकाओं के निपटारे में लंबे समय की देरी न्याय से इन्कार के समान है।
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि जमानत याचिकाओं के फैसले में अनावश्यक देरी करना अन्याय है और यह आरोपी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि ज़मानत और अग्रिम ज़मानत से जुड़ी याचिकाओं पर जल्द सुनवाई होना जरूरी है। शीर्ष अदालत ने इसके लिए समयसीमा भी तय की है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट को ज़मानत और अग्रिम ज़मानत की याचिकाओं पर अधिकतम दो महीने के भीतर फैसला करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समय पर निर्णय न होने से न केवल आरोपी को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ता है बल्कि यह न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ी याचिकाओं पर प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियमित और अग्रिम जमानत आवेदनों को अनिश्चितकाल तक लंबित रखे बिना गुण-दोष के आधार पर शीघ्रता से निपटाया जाना चाहिए। याचिकाओं के निपटारे में देरी न केवल आपराधिक प्रक्रिया संहिता के उद्देश्य को विफल करती है, बल्कि अनुच्छेद 14 और 21 में निहित संवैधानिक मूल्यों के विपरीत यह न्याय से वंचित करने के समान है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट यह सुनिश्चित करें कि उनके समक्ष या उनके अधिकार क्षेत्र के अधीनस्थ न्यायालयों में लंबित जमानत और अग्रिम जमानत के आवेदनों को शीघ्रता से निपटाया जाए। आम तौर पर याचिका दाखिल होने की तिथि से दो महीने की अवधि के भीतर निपटारा जो जाना चाहिए, सिवाय उन मामलों के जहां देरी स्वयं पक्षकारों के कारण हो। हाई कोर्ट जिला न्यायालयों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों को प्राथमिकता देने और अनिश्चितकालीन स्थगन से बचने के लिए आवश्यक निर्देश जारी करें। जांच एजेंसियों से भी अपेक्षा की जाती है कि वे लंबे समय से लंबित मामलों की जांच शीघ्रता से पूरी करें, ताकि अनावश्यक देरी के कारण न तो शिकायतकर्ता और न ही आरोपित को कोई नुकसान हो।
मौजूदा मामले में अग्रिम जमानत आवेदन 2019 में दायर किया गया था और इसे 2025 तक बॉम्बे हाईकोर्ट में लंबित रखा गया था। हाईकोर्ट ने कथित जालसाजी और अवैध भू हस्तांतरण से संबंधित आईपीसी की धाराओं के तहत दर्ज मामले में तीन आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। दो आरोपियों ने इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा लेकिन उसने छह साल तक आवेदनों को लंबित रखने के लिए हाईकोर्ट की आलोचना की। उसने आरोपियों की ओर से दायर अपीलों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यदि अपीलकर्ता इस मामले में गिरफ्तार होते हैं तो वे नियमित जमानत के लिए आवेदन करने के लिए स्वतंत्र होंगे।