मतदाताओं को चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की शैक्षणिक पृष्ठभूमि जानने का मौलिक अधिकार है और यदि कोई उम्मीदवार नामांकन पत्र में अपनी शैक्षणिक योग्यता के बारे में झूठा घोषणा-पत्र देता है, तो उसका चुनाव रद्द किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में मणिपुर कांग्रेस विधायक मैरेम्बम पृथ्वीराज का चुनाव रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यही कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने मैरेम्बम पृथ्वीराज का चुनाव इस आधार पर रद्द कर दिया था कि उन्होंने अपने नामांकन पत्र में झूठा उल्लेख किया था कि उनके पास एमबीए की डिग्री है।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस ए आर दवे और जस्टिस एल नागेश्वर राव की बेंच ने अपने फैसले में कहा था कि मतदाताओं को अपने उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि जानने का पूरा अधिकार है जिसमें उनकी शैक्षणिक योग्यता भी शामिल है। इसके बिना मतदान का अधिकार निरर्थक हो जाएगा। कोर्ट ने कहा था कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के बारे में सभी सूचनाएँ सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध होनी चाहिए क्योंकि सार्वजनिक जांच-परख लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को शुद्ध करने और योग्य विधायकों को चुनने के सबसे पक्के साधनों में से एक है।
“मतदाता को चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के बारे में जानकारी पाने का मौलिक अधिकार है। मतदाता के पास यह विकल्प होता है कि क्या वह किसी आपराधिक मामले में शामिल व्यक्ति को वोट देना चाहता है या नहीं। उसी तरह उसे यह अधिकार है कि वह तय करे कि शैक्षणिक योग्यता या संपत्ति का होना उसके प्रतिनिधि के चुनाव में कितना महत्वपूर्ण है” : सुप्रीम कोर्ट।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि “इस अदालत के कानून से यह स्पष्ट है कि हर मतदाता को उम्मीदवार की शैक्षणिक योग्यता जानने का मौलिक अधिकार है। इसी प्रकार जन प्रतिनिधित्व कानून, नियमों और फॉर्म-26 के प्रावधानों से यह भी स्पष्ट है कि उम्मीदवारों पर सही जानकारी देने का दायित्व है।”
कांग्रेस विधायक की दलील थी कि उनके वकील और एजेंट की ओर से नामांकन पत्र दाखिल करते समय ‘क्लर्कियल मिस्टेक’
हुई थी। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया था कि इस आधार पर उनका चुनाव रद्द न किया जाए क्योंकि यह कोई गंभीर त्रुटि नहीं थी। पृथ्वीराज ने नामांकन पत्र में लिखा था कि उन्होंने 2004 में मैसूर विश्वविद्यालय से एमबीए पास किया है। लेकिन कोर्ट ने उनकी यह दलील खारिज कर दी और कहा कि झूठी घोषणा ने चुनाव परिणाम को प्रभावित किया है और चुनाव रद्द होना ही चाहिए। कोर्ट ने यह भी दर्ज किया था कि उन्होंने 2008 के विधानसभा चुनाव में भी यही झूठी घोषणा की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था “अपीलकर्ता की यह दलील कि शैक्षणिक योग्यता से संबंधित घोषणा एक लिपिकीय त्रुटि थी, स्वीकार नहीं की जा सकती। यह गलती केवल एक बार नहीं हुई। 2008 से ही वह यह कह रहे थे कि उनके पास एमबीए की डिग्री है। फॉर्म-26 में शपथपत्र के साथ दी गई यह जानकारी झूठी घोषणा है। इसे ऐसा दोष नहीं कहा जा सकता जो गंभीर न हो। … अब यह कोई अनिर्णीत मुद्दा नहीं रह गया है कि हर उम्मीदवार को अपनी शैक्षणिक योग्यता का खुलासा करना ही होगा ताकि मतदाता के सूचना के अधिकार की पूर्ति हो सके। शैक्षणिक योग्यता के बारे में झूठी घोषणा करने के बाद उम्मीदवार यह नहीं कह सकता कि यह घोषणा महत्वहीन है।”