एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच सुनवाई कर रही थी। पांच सदस्यीय संविधानपीठ के सदस्य थे चीफ जस्टिस ए एन रे, जस्टिस एम एच बेग, जस्टिस एच आर खन्ना, जस्टिस वाई वी चंद्रचूड़ और जस्टिस पी एन भगवती। कोर्ट के सामने क़ानूनी सवाल था कि आपातकाल के दौरान नागरिकों को अनुच्छेद 21 के तहत मिले ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ के मौलिक अधिकार के हनन के ख़िलाफ़ पीड़ित व्यक्ति अदालत जा सकता है या नहीं ?
सरकार का पक्ष था कि आपातकाल में नागरिकों के मौलिक अधिकार पूरी तरह निलंबित होंगे! कोई अदालत, इस संबंध में कोई याचिका स्वीकार नहीं करेगी!
सुनवाई के दौरान जस्टिस एच आर खन्ना ने तत्कालीन अटॉर्नी जनरल नरेन डे से सवाल किया कि यदि कोई पुलिस अधिकारी व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण किसी अन्य व्यक्ति की हत्या कर दे तब भी ?
अटॉर्नी जनरल ने जवाब दिया – हां, जब तक आपातकाल जारी रहेगा, ऐसे मामले में भी कोई नहीं अदालत दखल नहीं दे सकती!
सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की बेंच ने 28 अप्रैल 1976 को 4:1 के बहुमत से वही फैसला सुनाया जो अटॉर्नी जनरल नरेन डे की दलील थी। एक अकेले जज जस्टिस एच आर खन्ना ने फैसले से असहमति जताई। उन्हें पता था कि इसकी क़ीमत उन्हें चुकानी पड़ेगी। सीनियरिटी के मुताबिक़ उन्हें देश का अगला मुख्य न्यायाधीश बनना था। इंदिरा गाँधी की सरकार उनसे नाराज़ हो गई। उनसे जूनियर जज जस्टिस एच एम बेग को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया गया। जस्टिस एच आर खन्ना ने राष्ट्रपति को इस्तीफा भेज दिया। जस्टिस वाई वी चंद्रचूड़ और जस्टिस पी एन भगवती भी बाद में मुख्य न्यायाधीश बने थे।
History teaches us, imbecility of men,
always invites the impudence of power.
(अर्थात जब जनता मूर्ख होती है, सत्ता उद्दंड और
अहंकारी हो जाती है।) – जस्टिस एच आर खन्ना (भूतपूर्व जज, सुप्रीम कोर्ट) की पुस्तक ‘मेकिंग ऑफ इंडियाज कंस्टीट्यूशन’ से।— Prabhakar Kumar Mishra (@PMishra_Journo) June 30, 2025
इस फैसले के करीब चार दशक बाद सुप्रीम कोर्ट में आधार की वैधता को चुनौती दी गई। कर्नाटक हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस पुत्तास्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार को अनुल्लंघनीय मानते हुए एडीएम जबलपुर मामले में कोर्ट के फैसले को पलट दिया था।
सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की जिस संविधान पीठ ने 1977 के उस फैसले को पलटा था उसमें जस्टिस वाई वी चंद्रचूड़ के पुत्र जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ भी शामिल थे।
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने एडीएम जबलपुर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को दोषपूर्ण ठहराते हुए लिखा था कि अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ संविधान की रचना नहीं है। संविधान द्वारा इन अधिकारों को प्रत्येक व्यक्ति में निहित मानवीय तत्व के आंतरिक और अविभाज्य भाग के रूप में मान्यता दी गई है। सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने आखिरकार जस्टिस एच आर खन्ना के असहमति वाले फैसले को स्वीकार 42 साल बाद 2018 में स्वीकार किया। जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कई मौकों पर जस्टिस एच आर खन्ना के लिए कहा कि ” वे अपने पिता (जस्टिस वाई. वी. चंद्रचूड़) के उस बहुमत निर्णय का हिस्सा बनने के बावजूद, जस्टिस एच आर खन्ना के रुख को सही मानते हैं और भारतीय संविधान की आत्मा की रक्षा करने के लिए उन्हें सलाम करते हैं।”
जब भी आपातकाल की बात होती है जस्टिस एच आर खन्ना याद किए जाते हैं।।