राजीव धवन: खलनायक नहीं नायक (फोटो: राजीव धवन के FB से)
सुप्रीम कोर्ट में जब रामजन्भूमि विवाद से जुड़े मामले में की सुनवाई चल रही थी, सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष से पेश हो रहे वकील राजीव धवन ने राम जन्मस्थान का नक्शा फाड़ दिया था। हिन्दू पक्ष के लोगों और राम मंदिर के समर्थकों ने उन्हें खलनायक घोषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लेकिन क्या धवन साहब वाकई खलनायक कहे जाने के क़ाबिल हैं? मैं ऐसा बिल्कुल नहीं मानता।
राजीव धवन ने जब जन्मस्थान का नक्शा फाड़ा था, मुझे बहुत आश्चर्य नहीं हुआ था। क्योंकि मुझे याद है 2017 का वह वाक़या जब तत्कालीन मुख्यन्यायाधीश दीपक मिश्रा की कोई बात इतनी चुभ गई थी कि धवन साहब ने वकालत छोड़ने का फैसला कर लिया था। 5 दिसंबर 2017 को अयोध्या मामले की सुनवाई हो रही थी। मुस्लिम पक्ष के तरफ से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अयोध्या मामले की सुनवाई 2019 के लोकसभा चुनाव तक टालने की मांग की। राजीव धवन और दुष्यंत दवे भी मुस्लिम पक्ष के लिए पेश हुए थे। तीनों ने बेंच पर आरोप लगाया कि उनकी बात नहीं सुनी जा रही है। तीनों ने कोर्ट छोड़कर जाने की धमकी दी थी। उसके बाद क्या हुआ था, कैसे अयोध्या मामले की सुनवाई टल गई थी ये बातें पहले बता चुका हूँ। (एक रूका हुआ फ़ैसला: अयोध्या विवाद के आख़िरी चालीस दिन में इस पर विस्तार से लिखा हुआ है)।
अगले दिन यानि 6 दिसंबर 2017 को दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच अधिकारों को लेकर चल रहे मामले की सुनवाई चल रही थी। धवन साहब दिल्ली सरकार के लिए पेश हो रहे थे। सीजेआई दीपक मिश्रा ने धवन साहब को टोका कि उनके ही पक्ष के दूसरे वकील ने जो दलीलें दे दी हैं उसे न दोहराएं। इसी बात पर सीजेआई और राजीव धवन में बहस हो गई। एक दिन पहले की बात अभी सीजेआई के जेहन में थी ही। बात इतनी बढ़ गयी कि जस्टिस दीपक मिश्रा ने कह दिया कि ‘ कोर्ट में आवाज़ ऊंची करके बात करने को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अगर बार ऐसे वकीलों के व्यवहार पर लगाम नहीं लगा सकती तो हमें ऐसा करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।’ जस्टिस दीपक मिश्रा ने आगे यह भी कह दिया था कि ऐसे वकील सीनियर वकील का ओहदा के लिए क़ाबिल नहीं हैं। धवन साहब को यह बात बहुत बुरी लगी थी और उन्होंने वकालत छोड़ने की घोषणा कर दी थी। धवन साहब ने सीजेआई दीपक मिश्रा के नाम पत्र लिखकर कहा था “आपके पास मुझे दिया गया सीनियर एडवोकेट का गाउन वापस लेने का अधिकार है। लेकिन इस पेशे की वर्षों की सेवा की यादगार के तौर पर मैं इस गाउन को अपने पास रखना चाहूँगा।” सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट वकीलों को उनकी वरिष्ठता और योग्यता के आधार पर सीनियर एडवोकेट नामित करता है। सीनियर एडवोकेट (वरिष्ठ वकील) अलग तरह का गाउन पहनता है। अब आप यह भी समझ गए होंगे कि वकालत के पेशे में केवल उम्र बढ़ने से वरिष्ठता नहीं आती है।
मुख्यन्यायाधीश दीपक मिश्रा की तरफ से धवन की चिट्ठी का कोई जवाब नहीं आया। लेकिन राजीव धवन के वकालत से संन्यास की घोषणा से सुप्रीम कोर्ट और न्यायपालिका से जुड़े लोग सकते में थे। सुप्रीम कोर्ट और हाइकोर्ट्स के रिटायर्ड जजों सहित तमाम सीनियर एडवोकेट्स ने धवन साहब से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की गुजारिश की। मेरी जानकारी में तो सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा जज ने भी धवन साहब को मनाने की कोशिश की थी। करीब दो हफ्ते में धवन साहब मान गए थे लेकिन अपने अंदाज में। जस्टिस दीपक मिश्रा के नाम लिखे चिट्ठी में धवन साहब ने लिखा था ‘कोर्ट और इसकी कार्यशैली में मौलिक तौर पर कुछ कमियां हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट और देश की न्याय व्यवस्था मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है .. और इनके ऊपर मेरा कर्ज अभी बाक़ी है।’ और इस तरह धवन साहब ने एक बार फिर अयोध्या विवाद में मुस्लिम पक्ष की पैरवी का बीड़ा उठा लिया था। एक नहीं, कई मौके पर कोर्ट रूम में राजीव धवन का सुप्रीम कोर्ट के जजों से नोकझोंक हुई है। अयोध्या केस में चूंकि धवन साहब मुस्लिम पक्ष की पैरवी कर रहे थे, शायद इसलिए विवाद थोड़ा ज्यादा बढ़ गया।
अयोध्या केस से जुड़े मुस्लिम पक्षकारों से पूछ कर देखिए, उनके लिए राजीव धवन किसी हीरो से कम नहीं हैं। धवन साहब ने अयोध्या मामले में मुस्लिम पक्ष के वकील के रूप में जितनी मजबूती से अपनी दलीलों को रखा था, शायद ही कोई और रख पाता। राजीव धवन इस केस से तब से जुड़े हैं जब बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा था। धवन साहब हाईकोर्ट में बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी की तरफ से हाईकोर्ट में पेश हुए थे। हाईकोर्ट ने जब 2010 में विवादित ज़मीन को रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच तीन बराबर हिस्सों में बांट दिया था, हाईकोर्ट के फैसले पर आपत्ति जताते हुए कहा था “यह एक तरह का पंचायती फैसला है। यह मुसलमानों के अधिकार छीन लेता है और हिंदुओं की भावनाओं को कानूनी अधिकार में बदल देता है।”
(‘एक रूका हुआ फ़ैसला: अयोध्या विवाद के आख़िरी चालीस दिन’ पुस्तक से। पुस्तक अमेज़न पर उपलब्ध है।)