मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी आर गवई की अगुवाई वाली मौजूदा कोलेजियम ने बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता आरती साठे को बॉम्बे हाईकोर्ट का जज बनाने की सिफारिश की है। इसे लेकर विवाद हो रहा है। महाराष्ट्र में विपक्षी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) ने आरती साठे के नाम की सिफारिश पर सवाल उठाया है और कहा है कि न्यायपालिका स्वतंत्र और निष्पक्ष होनी चाहिए। उन्होंने एक्स पर एक स्क्रीनशॉट भी पोस्ट किया जिसमें बताया गया कि साठे सत्तारूढ़ भाजपा से जुड़ी थीं और पार्टी की प्रवक्ता थीं। दूसरी तरफ, महाराष्ट्र बीजेप ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए खारिज किया है। बीजेपी ने कहा है कि आरती साठे कुछ साल पहले ही भाजपा प्रवक्ता पद से इस्तीफा दे चुकी थीं। उनका पार्टी से अब कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में उनकी योग्यता पर सवाल उठाने का कोई कारण नहीं है। आरती साठे एक वकील परिवार से हैं। उनके पिता, वरिष्ठ वकील अरुण साठे, राजनीति से भी जुड़े रहे हैं आरती साठे टैक्स विवाद, SAT और SEBI मामलों के साथ-साथ मैट्रिमोनियल केस भी देखती हैं।
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 2023 में जब जस्टिस विक्टोरिया गौरी को मद्रास हाईकोर्ट का जज बनाने की सिफारिश की थी, उस समय भी बहुत विवाद हुआ था। विक्टोरिया गौरी पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत भरे भाषण देने का आरोप लगा था। जस्टिस विक्टोरिया गौरी को जज बनाने की सिफारिश करने वाले कॉलेजियम की अगुवाई तत्कालीन सीजेआई जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ कर रहे थे। जस्टिस विक्टोरिया गौरी की नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। उधर विक्टोरिया गौरी जज के रूप में शपथ ले रही थीं, इधर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही थी।
बीजेपी महिला मोर्चा की पूर्व महासचिव और मद्रास हाईकोर्ट की एडवोकेट विक्टोरिया गौरी को मद्रास हाईकोर्ट का जज नियुक्त करने के कॉलिजियम की सिफारिश पर सरकार ने मुहर लगा दी है।
विक्टोरिया के धार्मिक और भड़काऊ बयानों के चलते उनकी नियुक्ति का विरोध हो रहा है। @news24tvchannel pic.twitter.com/qxQ2KphabP— Prabhakar Kumar Mishra (@PMishra_Journo) February 6, 2023
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पिछला राजनीतिक संबंध किसी तरह की कोई अयोग्यता नहीं थी। विक्टोरिया गौरी एक संवैधानिक कोर्ट में जज बनने के लिए सभी एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया को पूरा करती हैं। कोर्ट ने कहा कि जज के रूप में किसी उम्मीदवार की नियुक्ति को रोकने के लिए राजनीतिक संबंध कभी भी आधार नहीं रही है। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि कॉलेजियम की तरफ से सिफारिश किए गए नामों की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती।
आरती साठे को जज बनाने की सिफारिश पर महाराष्ट्र की राजनीति में खड़ा विवाद भी धीरे धीरे शांत हो जाएगा। क्योंकि हमारे देश में सियासत से न्यायपालिका और न्यायपालिका से सियासत में जाने की पुरानी परंपरा है। भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कई ऐसे जज रहे हैं, जिन्होंने या तो राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई थी या राजनीतिक परिवार में जन्मे थे।
• हमारे देश के सबसे महान न्यायाधीशों में से एक, जस्टिस कृष्णा अय्यर की पृष्ठभूमि भी राजनीतिक थी। हाईकोर्ट का जज बनने के पहले वे केरल की कम्युनिस्ट सरकार में स्वतंत्र विधायक और कैबिनेट मंत्री रहे थे। बाद में सुप्रीम कोर्ट का जज बने। जनहित याचिका, जेल सुधार, कैदियों के अधिकार से जुड़े ऐतिहासिक फैसले दिए। जस्टिस के एस हेगड़े 1957 में मद्रास हाईकोर्ट का जज बनने से पहले कांग्रेस के नेता और राज्य सभा सदस्य थे। 1967 में सुप्रीम कोर्ट का जज बने। बाद में दोबारा राजनीति में आ गए और लोकसभा अध्यक्ष चुने गए।
• जस्टिस बहारुल इस्लाम का तो केस अनूठा था। जस्टिस बहारुल इस्लाम दो बार कांग्रेस के राज्यसभा सांसद रहे। फिर 1972 में गुवाहाटी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने। 1980 में सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त हुए। सुप्रीम कोर्ट के जज के पद से इस्तीफा देकर फिर कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा चले गए।
• और भी कई नाम हैं जो पहले राजनीति में थे जैसे जस्टिस पी बी
सावंत, जस्टिस एस रत्नावेल पांडियन, जस्टिस आफताब आलम, जस्टिस गोपाल गौडा, जस्टिस बिक्रम चंद्र रे.. सुप्रीम कोर्ट का जज बनने से पहले ये सभी लोग किसी न किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े थे। भारतीय राजनीति में बहुत नाम ऐसे भी मिलेंगे जिन्होंने जज की हटने के बाद सियासत में गए। हाल के दिनों का सबसे ज्वलंत उदाहरण जस्टिस रंजन गोगोई का है जो मुख्य न्यायाधीश के पद से रिटायर होने के बाद राज्यसभा चले गए थे।