भारत के संविधान की प्रस्तावना
संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने का सरकार का फिलहाल कोई इरादा नहीं है। सरकार ने संसद को जानकारी दी है कि संविधान की प्रस्तावना से इन दोनों शब्दों को हटाने के लिए ‘औपचारिक रूप से कोई कानूनी या संवैधानिक प्रक्रिया’ नहीं शुरू की गई है।
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने एक लिखित प्रश्न के जवाब में राज्यसभा को यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि कुछ सार्वजनिक या राजनीतिक क्षेत्रों में इस पर चर्चा या बहस हो सकती है। लेकिन इन शब्दों के संशोधन के संबंध में सरकार द्वारा किसी औपचारिक फैसले या प्रस्ताव की घोषणा नहीं की गई है।
कानून मंत्री ने कहा कि सरकार का आधिकारिक रुख यह है कि संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्दों पर पुनर्विचार करने या (प्रस्तावना से) उन्हें हटाने की वर्तमान में कोई योजना या इरादा नहीं है।मंत्री ने कहा कि प्रस्तावना में संशोधन के संबंध में किसी भी चर्चा के लिए गहन विचार-विमर्श और व्यापक सर्व-सम्मति की आवश्यकता होगी, लेकिन अब तक सरकार ने इन प्रावधानों में बदलाव करने के लिए कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं शुरू की है।
अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा को बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने 1976 के संशोधन (42वां संविधान संशोधन) को चुनौती देने वाली याचिकाओं को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति प्रस्तावना तक विस्तारित है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि भारतीय संदर्भ में ‘समाजवादी’ एक कल्याणकारी राज्य (शासन) को व्यक्त करता है और निजी क्षेत्र के विकास में बाधा नहीं डालता है वहीं ‘पंथनिरपेक्ष’ संविधान के मूल ढांचे का अभिन्न हिस्सा है। कुछ सामाजिक संगठनों के पदाधिकारियों द्वारा बनाए गए माहौल के बारे में मेघवाल ने कहा कि कुछ समूह हो सकता है कि अपनी राय व्यक्त कर रहे हों, या इन शब्दों पर पुनर्विचार की वकालत कर रहे हों। उन्होंने कहा कि ऐसी गतिविधियां, मुद्दे पर सार्वजनिक विमर्श का माहौल तो बना सकती हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि सरकार के आधिकारिक रुख या कार्रवाई को प्रतिबिंबित करे।
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पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने प्रस्तावना में जोड़े गए इन शब्दों को नासूर बताकर इस चर्चा को हवा दे दी थी कि सरकार इन शब्दों को प्रस्तावना से हटा सकती है। जगदीप धनखड़ ने अपने बयान में कहा था कि ‘संविधान की प्रस्तावना परिवर्तनशील नहीं है। फिर भी आपातकाल में इसे बदल दिया गया और यह संविधान बनाने वालों की बुद्धिमत्ता के साथ विश्वासघात का संकेत है। आपातकाल के दौरान प्रस्तावना में जो शब्द जोड़े गए वे नासूर थे।’
जगदीप धनखड़ के अलावा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ( RSS) के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने भी प्रस्तावना में जोड़े गए इन शब्दों को लेकर पुनर्विचार करने की जरूरत बताई थी। आपातकाल के दौरान तत्कालीन इंदिरा गाँधी की सरकार ने 42वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान के प्रस्तावना में इन शब्दों को जोड़ा था।