सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ( फोटो: प्रभाकर मिश्रा )
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज के फैसले पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए कहा है कि जज आपराधिक मामलों की सुनवाई के योग्य नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर नाराज़गी जताई जिसमें हाईकोर्ट ने यह कहते हुए एक क्रिमिनल कंप्लेंट को रद्द करने से इनकार कर दिया था कि बकाया राशि की वसूली के लिए दीवानी मुकदमे का उपाय प्रभावी नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए टिप्पणी की कि जिस हाईकोर्ट जज ने यह आदेश पारित किया है, वो अपराधिक मामलों की सुनवाई के योग्य नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से कहा है कि उन्हें किसी सीनियर जज के साथ ही डिवीजन बेंच में बैठाया जाना चाहिए। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा है कि संबंधित जज के पास लंबित सभी अपराधिक मामले (क्रिमिनल केस) वापस लिए जाएं और कोई भी नया आपराधिक मामला आवंटित नहीं किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच एक विशेष अनुमति याचिका SLP)पर सुनवाई कर रही थी, जो इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस प्रशांत कुमार के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी। इसमें अपीलकर्ता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 406 के तहत जारी समन को रद्द करने की मांग थी।
ललिता टेक्सटाइल्स (शिकायतकर्ता ) ने आरोप लगाया कि उसने निर्माण में इस्तेमाल होने वाला धागा सप्लाई किया, जिसका 7 लाख 23 हजार 7 सौ ग्यारह रुपया अपीलकर्ता पर बकाया है। शिकायत दर्ज होने के बाद, उत्तरदाता/शिकायतकर्ता का बयान दर्ज हुआ और अपीलकर्ता को समन जारी हुआ।
अपीलकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया। लेकिन जस्टिस कुमार ने कहा कि चूंकि शिकायतकर्ता छोटा व्यापारी है और राशि बड़ी है, इसलिए इसे केवल दीवानी विवाद मानना न्याय का मजाक होगा।
जस्टिस प्रशांत कुमार ने अपने आदेश में लिखा कि चूंकि
शिकायतकर्ता बहुत छोटा व्यापारी है और उसके लिए यह राशि और ब्याज काफी बड़ी है। अगर उसे दीवानी वाद दायर करना पड़ा, तो इसे निपटने में सालों लगेंगे और उसे और पैसा खर्च करना पड़ेगा। सीधा कहें तो यह अच्छे पैसे के पीछे बुरे पैसे फेंकने जैसा होगा। अगर इस मामले को दीवानी अदालत भेजा गया तो यह न्याय का उपहास होगा और शिकायतकर्ता को अपूरणीय क्षति होगी।
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला ने हाईकोर्ट के पैरा 12 का हवाला देते हुए कहा : “जज ने यहां तक कह दिया कि बकाया राशि की वसूली के लिए शिकायतकर्ता को दीवानी ( सिविल);उपाय अपनाने को कहना अनुचित होगा, क्योंकि इसमें समय लगेगा। इसलिए उसे आपराधिक कार्यवाही करने की अनुमति दी जानी चाहिए। जज की ऐसी कानूनी समझ कि आपराधिक मुकदमे से बकाया राशि दिला दी जाएगी, चौंकाने वाली है।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारे पास हाईकोर्ट का आदेश रद्द करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। कोर्ट ने शिकायतकर्ता को बिना नोटिस दिए ही हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और मामले को दोबारा सुनवाई के लिए हाईकोर्ट के दूसरे जज को भेज दिया।
“जज ने यहां तक कह दिया कि बकाया राशि की वसूली के लिए शिकायतकर्ता को दीवानी ( सिविल) उपाय अपनाने को कहना अनुचित होगा, क्योंकि इसमें समय लगेगा। इसलिए उसे आपराधिक कार्यवाही करने की अनुमति दी जानी चाहिए। जज की ऐसी कानूनी समझ कि आपराधिक मुकदमे से बकाया राशि दिला दी जाएगी, चौंकाने वाली है।” – जस्टिस पारदीवाला
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस अप्रत्याशित फैसले में आदेश दिया है कि :
• मामला किसी अन्य जज को सौंपा जाए।
• संबंधित जज के पास मौजूद आपराधिक मामले (क्रिमिनल केस) तुरंत वापस लिया जाएं।
• उन्हें किसी अनुभवी सीनियर जज के साथ डिवीजन बेंच में बैठाया जाए।
• अगर वे एकल पीठ (सिंगल जज बेंच) में बैठते हैं, तो उन्हें कोई आपराधिक मामला न दिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस आदेश की प्रति इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भेजी जाए।