राष्ट्रपति के सवालों पर सुनवाई
विधानसभा से पारित विधेयकों को राष्ट्रपति और राज्यपाल के पास लंबित रखने से जुड़े राष्ट्रपति के सवालों पर सुप्रीम कोर्ट 22 जुलाई को सुनवाई करेगा। सुप्रीम कोर्टी ने 8 अप्रैल 2025 के अपने फैसले में विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए समय सीमा तय कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि विधानसभा द्वारा पारित किसी बिल को राज्यपाल और राष्ट्रपति तीन महीने से अधिक नहीं रोक सकते। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में संविधान के अनुच्छेद 201 का हवाला दिया था जिसमें कहा गया था कि राज्यपालों की ओर से भेजे गए बिल के मामले में राष्ट्रपति के पास पूर्ण वीटो या पॉकेट वीटो का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने ये भी कहा था कि उनके फैसले की भी न्यायिक समीक्षा हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद बहुत हंगामा मचा था। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कई मंचों से सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर सवाल खड़ा किया था।
समय सीमा तय करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से 14 संवैधानिक प्रश्नों पर राय मांगी थी। उसी मामले पर सुप्रीम कोर्ट 22 जुलाई को सुनवाई करने वाला है। सीजेआई जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर की पांच संसदीय संविधान पीठ इस मामले पर सुनवाई करेगी।
संविधान का अनुच्छेद 143 भारत के राष्ट्रपति को किसी भी कानून या तथ्य के ऐसे प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट से परामर्श लेने का अधिकार देता है जो सार्वजनिक महत्त्व का हो और या तो प्रश्न उठ चुका हो या उठने की संभावना हो। सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति को अपनी राय दे भी सकता है या देने से इंकार भी कर सकता है।
राष्ट्रपति के 14 सवाल, जिनपर राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी गई है :
1. जब राज्यपाल के सामने भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत कोई विधेयक प्रस्तुत किया जाता है तो उनके सामने संवैधानिक विकल्प क्या हैं?
2. क्या राज्यपाल भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत किसी विधेयक को प्रस्तुत किए जाने पर अपने पास उपलब्ध सभी विकल्पों का प्रयोग करते समय मंत्रिपरिषद द्वारा दी गई सहायता और सलाह के लिए बाध्य हैं ?
3. क्या राज्यपाल द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत संवैधानिक विवेक का प्रयोग किया जाना, न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है ?
4. क्या भारत के संविधान का अनुच्छेद 361, भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के कार्यों के संबंध में न्यायिक समीक्षा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है?
5. संवैधानिक रूप से निर्धारित समय सीमा और राज्यपाल द्वारा शक्तियों के प्रयोग के तरीके के अभाव में, क्या राज्यपाल द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत सभी शक्तियों के प्रयोग के लिए न्यायिक आदेशों के माध्यम से समय सीमाएं लगाई जा सकती हैं और प्रयोग के तरीके को निर्धारित किया जा सकता है?
6. क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक विवेक के प्रयोग की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है ?
7. राष्ट्रपति की शक्तियों को नियंत्रित करने वाली संवैधानिक योजना के प्रकाश में क्या राष्ट्रपति को भारत के संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत संदर्भ के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट की सलाह लेने और राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति की सहमति के लिए विधेयक को सुरक्षित रखने या अन्यथा सुप्रीम कोर्ट की राय लेने की आवश्यकता है?
8. क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 और अनुच्छेद 201 के अंतर्गत राज्यपाल और राष्ट्रपति के निर्णय कानून के लागू होने से पहले के चरण में न्यायोचित हैं?
9. क्या न्यायालयों के लिए किसी विधेयक के कानून बनने से पहले उसकी विषय-वस्तु पर न्यायिक निर्णय लेना स्वीकार्य है?
10. क्या संवैधानिक शक्तियों के प्रयोग और राष्ट्रपति/राज्यपाल के आदेशों को भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत किसी भी तरह से प्रतिस्थापित किया जा सकता है?
11. क्या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाया गया कानून, भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के अंतर्गत राज्यपाल की सहमति के बिना लागू कानून है?
12. भारत के संविधान के अनुच्छेद 145(3) के प्रावधान के मद्देनजर क्या माननीय न्यायालय की किसी भी पीठ के लिए यह अनिवार्य नहीं है कि वह पहले यह तय करे कि उसके समक्ष कार्यवाही में शामिल प्रश्न ऐसी प्रकृति का है, जिसमें संविधान की व्याख्या के रूप में कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल हैं। इसे कम से कम 5 न्यायाधीशों की पीठ को संदर्भित करे?
13. क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट की शक्तियां प्रक्रियात्मक कानून के मामलों तक सीमित हैं या भारत के संविधान का अनुच्छेद 142 ऐसे निर्देश जारी करने/आदेश पारित करने तक विस्तारित है ,जो संविधान या लागू कानून के मौजूदा मूल या प्रक्रियात्मक प्रावधानों के विपरीत या असंगत हैं?
14. क्या संविधान भारत के संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत मुकदमे को छोड़कर, केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच विवादों को हल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के किसी अन्य अधिकार क्षेत्र को रोकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले में कहा था कि यदि कोई विधेयक लंबे समय तक राज्यपाल के पास लंबित है तो उसे ‘मंजूरी प्राप्त’ राष्ट्रपति ने इस पर आपत्ति जताते हुए पूछा है कि जब देश का संविधान राष्ट्रपति को किसी विधेयक पर फैसले लेने का विवेकाधिकार देता है तो फिर सुप्रीम कोर्ट इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप कैसे कर सकता है।
संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट से सलाह मांगने वाले इस प्रावधान का बहुत कम इस्तेमाल होता है। सरकार चाहती तो सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर पुनर्विचार के लिए पुनर्विचार याचिका दायर कर सकती थी लेकिन केंद्र सरकार और राष्ट्रपति ने इस रास्ते को नहीं चुना, क्योंकि उन्हें पुर्नविचार याचिका पर सकारात्मक परिणाम की उम्मीद नहीं रही होगी।