केवल आरोपियों को ही नहीं, अपराध पीड़ित के परिजनों को भी अपील का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए आपराधिक न्याय व्यवस्था महत्वपूर्ण बदलाव किया है। अब तक की व्यवस्था के मुताबिक किसी अपराध के मामले में अपील का अधिकार केवल राज्य सरकार या फिर शिकायतकर्ता के पास ही था। सुप्रीम कोर्ट ने अब पीड़ितों और उनके आधिकारिक उत्तराधिकारियों को भी आरोपी के बरी होने की स्थिति में अपील करने का अधिकार दे दिया है।
मालेगांव ब्लास्ट मामले में NIA कोर्ट जब सभी आरोपियों को बरी किया तो सवाल उठा कि क्या महाराष्ट्र सरकार उस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर करेगी। फैसले को लेकर राज्य सरकार की प्रतिक्रिया कुछ ऐसी थी कि लगा ही नहीं कि सरकार इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देने की मनसा रखती है। इसलिए किसी ने सूचना के अधिकार क़ानून के तहत सरकार से पूछा कि क्या सरकार का मालेगांव ब्लास्ट मामले में NIA कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील दायर करने कोई विचार है? महाराष्ट्र सरकार के कानून एवं न्याय विभाग ने जानकारी दी कि थी कि लोक अभियोजक कार्यालय को अभी तक इस मामले में अपील दायर करने का कोई प्रस्ताव प्राप्त नहीं हुआ है।
मुंबई की विशेष NIA अदालत ने मालेगांव बम विस्फोट मामले में सभी 7 आरोपियों को बरी कर दिया था, जिनमें पूर्व भाजपा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित भी शामिल हैं। 29 सितंबर, 2008 को महाराष्ट्र के मालेगांव में बम विस्फोट हुआ था, जिसमें 6 लोगों की जान गई थी और करीब 100 लोग घायल हुए थे। तब रमजान का महीना चल रहा था।
अब मालेगांव ब्लास्ट के पीड़ित परिवार वालों को NIA कोर्ट के फैसले खिलाफ अपील की लिए राज्य सरकार पर निर्भर नहीं रहना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि पीड़ितों और उनके आधिकारिक उत्तराधिकारियों को भी आरोपी के बरी होने की स्थिति में अपील करने का अधिकार होगा। अभी तक यह अधिकार केवल राज्य सरकार या फिर शिकायतकर्ता के पास ही था।
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले सप्ताह अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि जैसे किसी आरोपी को दोषी मान लिया जाता है, तो उसे आगे अपील करने का आधिकार है, ठीक वैसे ही अपराध के पीड़ित व्यक्ति को भी आरोपी के रिहा होने, मुआवजे के कम मिलने की स्थिति में आगे अपील करने का अधिकार होने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि “अपराध के पीड़ित का अधिकार उसी स्तर पर रखा जाना चाहिए, जिस तरह आरोपी के दोषी करार होने पर उसे धारा 374 के तहत अपील का अधिकार मिला हुआ है। .. ..अपराध से पीड़ित व्यक्ति, चाहे वह चोटिल हुआ हो या आर्थिक तौर पर उसे कम या भारी नुकसान हुआ हो, वह आगे अपील कर सकता है।
“अपराध के पीड़ित का अधिकार उसी स्तर पर रखा जाना चाहिए, जिस तरह आरोपी के दोषी करार होने पर उसे धारा 374 के तहत अपील का अधिकार मिला हुआ है।” – सुप्रीम कोर्ट
कोर्ट ने ये भी कहा है कि अगर अपील करने और केस की प्रक्रिया के दौरान पीड़ित की मृत्यु हो जाती है, तो आधिकारिक तौर पर उसका उत्तराधिकारी उसी अपील को आगे बढ़ा सकता है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी के रिहा होने की स्थिति में केवल राज्य या शिकायतकर्ता की अपील पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। अगर पीड़ित चाहे तो सीधे तौर पर और अपने दम पर भी अपील कर सकता है। इस अधिकार को सीमित नहीं किया जा सकता।
केस की पृष्ठभूमि
उत्तराखंड में 1992 में हुई एक हत्या के मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 2004 में तीन लोगों को दोषी घोषित करार दिया गया था। निचली अदालत के फैसले के खिलाफ आरोपियों नेहाईकोर्ट में अपील की और हाई कोर्ट ने 2012 में इन्हें निर्दोष घोषित कर दिया। हाईकोर्ट के फैसले को मृतक के बेटे ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। इसी मामले में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने यह ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मृतक के बेटे की अपील पर मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी है।