आपका आचरण अविश्वास पैदा करता है : सुप्रीम कोर्ट
बंगले पर कैश मिलने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशंवत वर्मा की याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने उनसे कुछ सख्त सवाल पूछे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित इन- हाउस कमेटी की उस रिपोर्ट को जस्टिस वर्मा ने चैलेंज किया है जिसके आधार पर उन्हें पद से हटाने लिए सरकार को लिखा गया था।
जस्टिस वर्मा ने अपनी याचिका में कहा है कि :
1. जांच प्रक्रिया अनियमित और अवैध थी।
2. उन्हें रिपोर्ट की कॉपी नहीं दी गई।
3. बिना उनका पक्ष सुने रिपोर्ट लीक की गई।
4. संविधान के अनुच्छेद 124(4) और (5) के तहत जो प्रक्रिया तय है, उसे नजरअंदाज किया गया।
जस्टिस वर्मा के लिए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल पेश हुए थे। कपिल सिब्बल जब से यह मामला संज्ञान में आया है तब से जस्टिस यशवंत वर्मा के बचाव में बोल रहे हैं। उन्होंने पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाया था। बिना FIR दर्ज किए जांच पर भी सवाल उठाया था। कमेटी की जांच पर सवाल उठाते हुए सिब्बल ने कहा था कि कमेटी को ये जांच करना था कि जस्टिस वर्मा के बंगले के आउटहाउस में पैसे कहां से आए, लेकिन इसकी जांच नहीं गई। तत्कालीन सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना द्वारा कमेटी की रिपोर्ट को सार्वजनिक किए जाने पर भी उन्होंने आपत्ति दर्ज करायी थी।
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 124 (सुप्रीम कोर्ट की स्थापना और गठन) के तहत एक प्रक्रिया है और किसी न्यायाधीश के बारे में सार्वजनिक तौर पर बहस नहीं की जा सकती है। सिब्बल ने कहा कि संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर वीडियो जारी करना, सार्वजनिक टीका टिप्पणी और मीडिया द्वारा न्यायाधीशों पर आरोप लगाना प्रतिबंधित है। उन्होंने कहा कि कमेटी ने इन- हाउस प्रक्रिया की गोपनीयता का उल्लंघन किया है क्योंकि रिपोर्ट न तो सीलबंद थी और न ही याचिकाकर्ता को पूर्व में दी गई थी, लेकिन मीडिया में लीक हो गई।
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जो बातें कपिल सिब्बल एक वकील के हैसियत से बोल रहे थे, वो सारी बातें जस्टिस वर्मा की याचिका में कही गई हैं। सुनवाई के दौरान जब कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कमेटी की जांच प्रक्रिया पर सवाल खड़ा किया तब कोर्ट ने पूछा कि : यदि आप इन‑हाउस जांच प्रक्रिया को अवैध मानते थे, तो आपने उसमें हिस्सा क्यों लिया? क्या आपको उम्मीद थी कि रिपोर्ट आपके अनुकूल होगी ?
यदि आप इन‑हाउस जांच प्रक्रिया को अवैध मानते थे, तो आपने उसमें हिस्सा क्यों लिया? क्या आपको उम्मीद थी कि रिपोर्ट आपके अनुकूल होगी ? – सुप्रीम कोर्ट
सबसे पहले जस्टिस दीपांकर दत्ता ने पेटीशन की ड्राफ्टिंग और जस्टिस वर्मा द्वारा इस मामले में शामिल किए गए पक्षकारों को लेकर सवाल खड़ा किया। जस्टिस दत्ता ने कहा कि “यह याचिका ऐसे नहीं दाखिल की जानी चाहिए थी। आपकी समस्या सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रिया से है, इसलिए मुख्य पक्ष यहाँ सुप्रीम कोर्ट होना चाहिए।” जस्टिस वर्मा ने मुख्य पक्षकार यूनियन ऑफ इंडिया यानी केंद्र सरकार को बनाया है।
कोर्ट ने अगला सवाल किया कि आपकी याचिका में इन‑हाउस कमेटी की जांच रिपोर्ट याचिका में क्यों नहीं शामिल की गई?
कोर्ट ने पूछा कि क्या आप जानबूझकर रिपोर्ट संलग्न नहीं करना चाहते, भले ही वह सार्वजनिक डोमेन में हो?
कोर्ट का अगला सवाल था कि जब इन हाउस कमेटी का गठन हुआ और आपको इस कमेटी से दिक्कत थी तब आपने इसे चुनौती क्यों नहीं दी ?
कोर्ट ने आगे कहा कि आप उस कमेटी के सामने पेश हो चुके हैं। आप एक संवैधानिक पद पर हैं, फिर कैसे कह सकते हैं कि आपको जानकारी नहीं थी?.. एक जज यह नहीं कह सकता कि उसे प्रक्रिया या रिपोर्ट का पता नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा के वकील कपिल सिब्बल से कहा कि अगली सुनवाई में वह एक पन्ने पर ‘बुलेट प्वाइंट’ में अपनी दलीलें लिख कर लाएं और पेटीशन में पक्षकार बनाए गए नामों में संशोधन करें। इस मामले पर अगली सुनवाई 30 जुलाई को होगी।
जस्टिस यशवंत वर्मा ने तत्कालीन सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना द्वारा आठ मई को की गई उस सिफारिश को भी रद्द किए जाने का अनुरोध किया था, जिसमें सीजेआई ने संसद से जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने का आग्रह किया था।
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