तुष्टीकरण के नाम पर
तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के लिए गुजाराभत्ता से जुड़े शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के 1985 के फैसले के बाद तत्कालीन कांग्रेस ने जो काम किया था, वही काम केंद्र की मोदी सरकार ने SC ST एक्ट मामले में में किया। कांग्रेस की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने के लिए संसद से क़ानून लेकर आ गई थी। SC- ST एक्ट के दुरूपयोग को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने डॉ सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र मामले में 2018 में एक व्यवस्था बनाई थी। केंद्र की मोदी सरकार ने कोर्ट के उस फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए संसद से क़ानून पास करा लिया। इसीलिए आज कुछ लोग SC-ST कानून को मोदी एक्ट भी कहते हैं!
क्या था डॉ सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र मामला
महाराष्ट्र के सतारा जिला में कराड़ एक जगह है। वहां के गवर्नमेंट फार्मेसी कॉलेज में एक स्टोरकीपर थे। नाम था भास्कर करभारी गाडेवाल। गाडेवाल अनुसूचित जाति से थे। बाद में उनका ट्रांसफर पुणे के Government Distance Education Institute में हो गया था।
भास्कर करभारी गाडेवाल की नौकरी सरकारी थी और जैसा कि सरकारी नौकरियों में होता है, प्रत्येक कर्मचारी का Annual Confidential Report तैयार होता है। भास्कर करभारी गाडेवाल के वरिष्ठ अधिकारियों डॉ. सतीश भिसे और डॉ. किशोर बुराडे ने उनकी Annual Confidential Report में उनके चरित्र और ईमानदरी को लेकर प्रतिकूल टिप्पणियां की कर दी। चूंकि दोनों अधिकारी नॉन SC/ST थे, गाडेवाल ने इन अधिकारियों के खिलाफ SC/ST Act के तहत FIR दर्ज करा दिया। ये बात 2006 की है।।
सरकारी अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए सरकार की मंजूरी की जरूरत होती है। पुलिस ने उन अधिकारियों पर मुकदमा चलाने के लिए sanction मांगी।
Sanction की फाइल डॉ. सुभाष काशीनाथ महाजन के पास आई, जो उस समय महाराष्ट्र के Director of Technical Education थे।
20 जनवरी 2011 को डॉ महाजन ने sanction देने से इनकार कर दिया। sanction के अभाव में केस आगे नहीं बढ़ सका। पुलिस ने C-summary रिपोर्ट दाखिल कर दी और मामला बंद हो गया। फिर क्या था ! भास्कर करभारी गाडेवाल ने sanction से मना करने वाले अधिकारी डॉ सुभाष काशीनाथ महाजन के खिलाफ भी SC ST एक्ट में मुकदमा दर्ज करा दिया। यही इस केस का महत्वपूर्ण मोड़ था।
गाडेवाल ने आरोप लगाया कि डॉ महाजन ने गलत तरीके से sanction रोक दिया, जबकि sanction देने या रोकने का अधिकार राज्य सरकार के पास था। डॉ महाजन पर SC/ST Act की धाराओं के साथ-साथ IPC की धाराएं भी लगाई गईं।
मामला हाईकोर्ट पहुंचा। डॉक्टर महाजन ने बॉम्बे हाईकोर्ट में FIR रद्द करने की मांग की, लेकिन जैसा कि SC ST एक्ट में आम तौर पर होता है, हाईकोर्ट ने डॉक्टर महाजन को कोई राहत नहीं दी।
इसके बाद डॉ महाजन ने देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस यू.यू. ललित जो बाद में CJI नियुक्त हुए थे, की बेंच ने सुनवाई की। 20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने डॉ महाजन के खिलाफ FIR को abuse of process मानते हुए रद्द कर दिया। और साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इसे SC ST एक्ट का दुरुपयोग मानते हुए इस क़ानून के दुरुपयोग और गिरफ्तारी की प्रक्रिया पर व्यापक directions दे दिए।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि SC/ST Act का उद्देश्य वास्तविक पीड़ितों को संरक्षण देना है। इसका इस्तेमाल निर्दोष लोगों को फंसाने या निजी रंजिश निकालने के लिए नहीं होना चाहिए।
कोर्ट ने अपने फैसला में व्यवस्था दिया कि
1. हर मामले में तत्काल गिरफ्तारी की जरूरी नहीं है – यदि प्रथम दृष्टया SC/ST Act का अपराध नहीं बनता या शिकायत prima facie mala fide दिखाई देती है, तो anticipatory bail पर पूर्ण रोक नहीं होगी। जबकि इस क़ानून में anticipatory bail पर पूरी तरह रोक थी।
2. सरकारी कर्मचारियों को अनावश्यक गिरफ्तारी से बचाने के लिए कोर्ट ने व्यवस्था दिया कि सरकारी कर्मचारी को गिरफ्तार करने से पहले उसके appointing authority की अनुमति लेनी होगी।
3. गैर-सरकारी व्यक्ति की गिरफ्तारी के पहले प्रारंभिक जांच की शर्त रखी गई कि पहले DSP स्तर के अधिकारी द्वारा प्रारंभिक जांच की जाएगी और यदि लगता है कि SC/ST Act का अपराध बनता है, मामला झूठा या मोटिवेटेड नहीं है.. तभी गिरफ्तारी होगी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध और हिंसा
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद हंगामा मच गया। देश भर में प्रदर्शन होने लगे। कई राज्यों में हिंसक झड़पें हुईं। बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। कई जगह आगजनी, तोड़फोड़ और पुलिस कार्रवाई हुई। इस विरोध प्रदर्शन के दौरान कम-से-कम 14 लोगों की मौत की रिपोर्ट हुई थी।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र की बीजेपी सरकार ने तत्काल रिव्यू पिटीशन दायर किया था और फैसले में बदलाव की मांग की थी.. लेकिन प्रदर्शनकारी सरकार से तत्काल विधायी हस्तक्षेप की मांग कर रहे थे।
सरकार दबाव में थी। ठीक वैसे ही जैसे शाहबानो के मामले तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के लिए गुजाराभत्ता से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के 1985 के फैसले के बाद तत्कालीन कांग्रेस सरकार दबाव में थी।
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मोदी सरकार ने भी वही किया जो शाहबानो मामले में तत्कालीन राजीव गाँधी सरकार ने किया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संसद से क़ानून में बदलाव किया गया। SC ST act में नया Section 18A जोड़ा गया। सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया गया। यानी डॉ सुभाष काशीनाथ महाजन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने SC ST एक्ट का दुरुपयोग रोकने के लिए जो सेफगार्ड बनाया था, संसद ने क़ानून बनाकर उस सेफगार्ड को वापस ले लिया।
सेक्शन 18A में व्यवस्था दी गई कि :
1. SC/ST Act के तहत FIR दर्ज करने के लिए preliminary enquiry की कोई जरूरत नहीं होगी।
2. आरोपी की गिरफ्तारी के लिए किसी अधिकारी की पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं होगी।
3. अग्रिम जमानत यानि Anticipatory bail का प्रावधान SC/ST Act के मामलों में लागू नहीं होगा।
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सेक्शन 18A की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
सेक्शन 18A की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। 10 फरवरी 2020 को Prathvi Raj Chauhan बनाम Union of India मामले में सुप्रीम कोर्ट ने Section 18A की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। लेकिन कोर्ट ने कहा कि यदि शिकायत को देखने पर prima facie SC/ST Act का अपराध ही नहीं बनता यानी प्रथम दृष्टया मामला फर्जी लगता है। तो anticipatory bail दी जा सकती है।
मोदी सरकार द्वारा संसद के जरिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के चलते ही कुछ लोग इसे sc st act के बदले मोदी कानून कहते हैं। और यह भी कहा जाता है कि जिस तरह शाहबानो मामले में कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण करते हुए संसद से कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदल दिया था, मोदी सरकार ने एससी- एसटी समुदाय के तुष्टिकरण के लिए संसद से क़ानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाया गया सेफगार्ड वापस हटा दिया था।