आरक्षण को लेकर देश में एक नई बहस छिड़ने वाली है। सुप्रीम कोर्ट एससी-एसटी, ओबीसी आरक्षण में आय के आधार पर प्राथमिकता निर्धारित करने की मांग पर विचार करने को तैयार हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया गया। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि याचिका कर्ता को काफी विरोध का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि यह बेहद संवेदनशील मामला है।
याचिका में मांग की गई है कि आरक्षण का लाभ पात्र समुदायों के सबसे गरीब लोगों को पहले मिले और इसके लिए आय-आधारित प्राथमिकता लागू की जाए। याचिका के अनुसार, दशकों से आरक्षण लागू होने के बावजूद आर्थिक रूप से सबसे कमजोर वर्ग अक्सर आरक्षण के लाभ से वंचित रह जाते हैं और अपेक्षाकृत संपन्न लोग ही आरक्षित वर्ग के भीतर अधिकतर लाभ उठा लेते हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह कदम संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के अनुरूप होगा और समान अवसर सुनिश्चित करेगा, जबकि मौजूदा आरक्षण कोटे में कोई बदलाव नहीं होगा।
दशकों से आरक्षण लागू होने के बावजूद आर्थिक रूप से सबसे कमजोर वर्ग अक्सर आरक्षण के लाभ से वंचित रह जाते हैं और अपेक्षाकृत संपन्न लोग ही आरक्षित वर्ग के भीतर अधिकतर लाभ उठा लेते हैं। – याचिका में रखी गई दलील।
याचिका में कहा गया कि आय-आधारित प्राथमिकता से यह सुनिश्चित होगा कि मदद सबसे पहले जरूरतमंदों तक पहुंचे। यूपी निवासी रमाशंकर प्रजापति और यमुना प्रसाद द्वारा दाखिल याचिका में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट सरकार को रोजगार एवं शैक्षणिक अवसरों में अधिक न्यायसंगत एवं समान रूप से आरक्षण व्यवस्था सुनिश्चित करने हेतु नीतियां बनाने का निर्देश दें, जिससे आरक्षण के लाभ का वितरण मेरिट-कम-मीन्स (योग्यता एवं आर्थिक आधार) दृष्टिकोण से हो सके। साथ ही कहा कि प्रत्येक आरक्षित श्रेणी में आय-आधारित वरीयताओं को लागू करने का निर्देश दे जिससे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के आर्थिक रूप से कमजोर अभ्यर्थियों के बीच आरक्षण लाभ का समान वितरण सुनिश्चित हो सके।
जनहित याचिका में कहा गया है कि अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणियों से संबंधित याचिकाकर्ता, वर्तमान याचिका के माध्यम से इन समुदायों के भीतर आर्थिक असमानताओं को उजागर करना चाहते हैं, जिसके कारण मौजूदा आरक्षण नीतियों के तहत लाभों का असमान वितरण हुआ है। याचिका में यह तर्क भी दिया गया है कि आरक्षण की रूपरेखा शुरू में ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों के उत्थान के लिए शुरू की गई थी, लेकिन वर्तमान प्रणाली इन समूहों में अपेक्षाकृत समृद्ध आर्थिक स्तर और उच्च सामाजिक स्थिति वाली पृष्ठभूमि से संबंधित लोगों को असमान रूप से लाभान्वित करती है, जबकि आर्थिक रूप से सबसे वंचित सदस्यों के लिए अवसरों तक सीमित पहुंच होती है। याचिका में कहा गया है कि कोर्ट ऐसे दिशा-निर्देश बनाने का आदेश दें जिससे प्रत्येक आरक्षित श्रेणी के आर्थिक रूप से कमजोर अभ्यर्थियों को एक उप-श्रेणी के रूप में माना जाए तथा उन्हें चयन प्रक्रिया में अधिक योग्यता एवं प्राथमिकता प्रदान की जाए, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में तय किया है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के कई लोग आरक्षण के माध्यम से सरकारी नौकरियों की उच्च श्रेणियों में प्रवेश करके सामाजिक और आर्थिक रूप से सक्षम हो सकते हैं और अपने बच्चों को सर्वोत्तम शिक्षा और सुविधाएँ प्रदान कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि इस पर विचार किया जाए कि क्या ऐसे वर्ग के लोगों को अपने ही समुदाय के उन सदस्यों की कीमत पर आरक्षण का लाभ उठाना जारी रखना चाहिए जो गरीबी में जी रहे हैं और सामाजिक समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
अब समय आ गया है कि इस पर विचार किया जाए कि क्या ऐसे वर्ग के लोगों को अपने ही समुदाय के उन सदस्यों की कीमत पर आरक्षण का लाभ उठाना जारी रखना चाहिए जो गरीबी में जी रहे हैं और सामाजिक समस्याओं का सामना कर रहे हैं – सुप्रीम कोर्ट
एससी-एसटी, ओबीसी आरक्षण में आय के आधार पर प्राथमिकता निर्धारित करने की इस नई बहस से विवाद खड़ा होने की प्रबल आशंका है। क्योंकि पिछले साल जब सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय संविधान पीठ ने बहुमत के फैसले में कहा था कि राज्यों को अनुसूचित जातियों (एससी) के भीतर उप-वर्गीकरण करने का संवैधानिक अधिकार है, जो सामाजिक रूप से विषम वर्ग है, ताकि उन जातियों के उत्थान के लिए आरक्षण प्रदान किया जा सके जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से अधिक पिछड़ी हैं। तब इस फैसले के खिलाफ खूब विरोध प्रदर्शन हुआ था। उसी फैसले में जस्टिस बी आर गवई ने अलग से लिखे अपने फैसले में कहा था कि राज्यों को एससी और अनुसूचित जनजातियों (SC/ST) के भीतर भी क्रीमीलेयर की पहचान करने की नीति बनाई जानी चाहिए। उनमें जो लोग सक्षम हैं, उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं देना चाहिए। उनके इस सलाह का देशव्यापी विरोध हुआ था।