सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ( फोटो: प्रभाकर मिश्रा )
राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए किसी विधेयक पर निर्णय की समयसीमा तय किए जाने को लेकर प्रेसिडेंशियल रेफरेन्स पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ मंगलवार को सुनवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए समय सीमा निर्धारित कर दी थी। उसके बाद राष्ट्रपति ने प्रेसिडेंशियल रेफरेन्स भेजकर इस मामले से जुड़े 14 संवैधानिक सवालों पर सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी थी।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने 8 अप्रैल 2025 के अपने फैसले में किसी विधेयक पर निर्णय लेने के लिए राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए समयसीमा तय की थी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि विधानसभा से पारित विधेयक पर राज्यपाल को तीन महीने के भीतर फैसला लेना होगा। अगर राज्यपाल बिल को राष्ट्रपति के पास भेजते हैं, तो राष्ट्रपति को भी तीन महीने के अंदर फैसला देना होगा। कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर समयसीमा का उल्लंघन होता है, तो राज्य सरकार अदालत का दरवाजा खटखटा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी फैसले में अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए तमिलनाडु के राज्यपाल द्वारा एक साल से अधिक समय से अपने पास लंबित रखे गए 10 विधेयकों को स्वीकृत मान लिया था।
राष्ट्रपति के सवाल
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 के प्रेसिडेंशियल रेफरेंस के जरिए सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर 14 सवालों पर कोर्ट की राय मांगी थी। ये सवाल हैं:
1. जब राज्यपाल के पास कोई विधेयक अनुच्छेद 200 के तहत हस्ताक्षर के लिए आता है, तो उनके पास कौन-कौन से संवैधानिक विकल्प होते हैं?
2. क्या राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह माननी ज़रूरी होती है?
3. क्या अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल द्वारा लिए गए निर्णयों की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है?
4. क्या अनुच्छेद 361 (जो राष्ट्रपति और राज्यपाल को पद पर रहते हुए कानूनी कार्रवाई से छूट देता है) राज्यपाल के अनुच्छेद 200 के तहत लिए गए फैसलों की कोर्ट द्वारा जांच पर पूरी तरह रोक लगाता है?
5. अगर संविधान में राज्यपाल के फैसले लेने का समय और तरीका तय नहीं किया गया है, तो क्या अदालत अपने आदेश से समय सीमा और तरीका तय कर सकती है?
6. क्या राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 201 के तहत लिए गए फैसलों (जो राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को भेजे गए विधेयकों से जुड़े होते हैं) की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है?
7. क्या अदालत अपने आदेशों से राष्ट्रपति के लिए अनुच्छेद 201 के तहत निर्णय लेने की समय सीमा और तरीका तय कर सकती है?
8. जब कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को भेजा जाता है, तो क्या राष्ट्रपति को उस पर फैसला लेने से पहले सुप्रीम कोर्ट से सलाह लेनी होती है?
9. क्या राज्यपाल और राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 200 और 201 के तहत लिए गए निर्णयों की समीक्षा उस समय की जा सकती है जब विधेयक अभी कानून नहीं बना हो? क्या अदालत किसी विधेयक की सामग्री पर उसके कानून बनने से पहले विचार कर सकती है?
10. क्या अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट अपने आदेश से राष्ट्रपति या राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों की जगह ले सकता है?
11. क्या राज्य विधानसभा द्वारा पारित कोई विधेयक राज्यपाल की मंज़ूरी के बिना कानून माना जा सकता है?
12. क्या यह अनिवार्य नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट की पीठ यह जांच करे कि कोई मामला संविधान की व्याख्या से जुड़ा “महत्वपूर्ण प्रश्न” है और उसे कम से कम पांच जजों की पीठ को भेजा जाए, जैसा कि अनुच्छेद 145(3) में कहा गया है?
13. क्या अनुच्छेद 142 सिर्फ प्रक्रिया संबंधी मामलों तक सीमित है या सुप्रीम कोर्ट ऐसे आदेश भी दे सकता है जो संविधान के मौजूदा प्रावधानों (सामग्री या प्रक्रिया दोनों) के खिलाफ हों?
14. क्या सुप्रीम कोर्ट केंद्र और राज्यों के बीच विवाद को अनुच्छेद 131 के तहत मूल वाद (original suit) के अलावा किसी और तरीके से नहीं सुलझा सकता?
इन्हीं सवालों का जवाब तलाशने के लिए संविधान पीठ सुनवाई करने वाली है। सुनवाई से पहले कोर्ट में दायर अपने जवाब में केंद्र सरकार ने राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए समय सीमा निर्धारित करने का विरोध करते हुए कहा है कि यह समय सीमा, शक्तियों के नाजुक पृथक्करण को बिगाड़ देगी। इससे संवैधानिक अव्यवस्था भी जन्म लेगी। केंद्र ने तर्क दिया है कि राज्यपाल और राष्ट्रपति के पद राजनीतिक रूप से पूर्ण हैं और लोकतांत्रिक शासन के उच्च आदर्शों का प्रतिनिधित्व करते हैं। किसी भी कथित चूक का समाधान राजनीतिक और संवैधानिक तंत्रों के माध्यम से किया जाना चाहिए, न कि जरूरी ना होने वाले न्यायिक हस्तक्षेपों के माध्यम से। सॉलिसिटर जनरल के जरिए दायर जवाब में केंद्र सरकार ने कहा कि अनुच्छेद 142 में निहित अपनी असाधारण शक्तियों के तहत भी, सुप्रीम कोर्ट संविधान में संशोधन नहीं कर सकता या संविधान निर्माताओं की मंशा को विफल नहीं कर सकता, बशर्ते कि संवैधानिक पाठ में ऐसी कोई प्रक्रियागत जनादेश न हों।
सुनवाई करने वाली बेंच
इस संविधान बेंच की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ही कर रहे हैं। उनके साथ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर भी इस संविधान पीठ में शामिल हैं। इन पांच जजों में से से चीफ जस्टिस गवई के बाद सीनियरिटी के मुताबिक़ तीन जज भविष्य में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बनने वाले हैं। जस्टिस गवई के बाद जस्टिस सूर्यकांत नवंबर 2025 में, जस्टिस विक्रम नाथ फरवरी 2027 में, जस्टिस पीएस नरसिम्हा अक्टूबर 2027 में सीजेआई बन सकते हैं।
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