जंतर-मंतरः विरोध का प्रतीक
दिल्ली हाईकोर्ट में ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमिटी की याचिका आई थी। याचिका में कहा गया था कि उन्हें जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करना है। दिल्ली पुलिस से इसके लिए अनुमति माँगी गई है। लेकिन पुलिस न तो अनुमति दे रही है और ना ही इंकार कर रही है। कोर्ट से अनुरोध किया गया था कि कोर्ट इसमें दख़ल दे और पुलिस से कहे कि इसपर पुलिस निर्णय ले। कोर्ट को इतना ही करना था कि वह पुलिस से पूछ लेती कि क्या समस्या है। पुलिस विरोध प्रदर्शन की अनुमति देती भी है और कई मौकों पर मना भी कर सकती है। लेकिन जस्टिस अमित महाजन ने कोर्ट में मौजूद दिल्ली पुलिस के वकील से पूछ लिया –
“प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति क्यों दी जाती है ? आप इसे बंद क्यों नहीं कर देते? यह दिल्ली के अंदर नहीं होना चाहिए।” – जस्टिस अमित महाजन, जज, दिल्ली हाईकोर्ट।
जस्टिस अमित महाजन ने ये भी कहा कि राजधानी के बीचों-बीच प्रदर्शनों से शहर को बेवजह बंधक नहीं बनाया जाना चाहिए।
दिल्ली पुलिस के वकील ने जस्टिस महाजन को बताया – माई लॉर्ड, सुप्रीम कोर्ट में एक ऐसी याचिका आई है जिसमें माँग की गई है कि जंतर मंतर को विरोध प्रदर्शन का स्थल नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट इस पर विचार कर रहा है। तब जस्टिस महाजन ने कहा ” हाँ, मेरे हिसाब से, ऐसा नहीं होना चाहिए।”
कॉकरोच प्रोटेस्ट के ख़त्म होने के तत्काल बाद सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर हुई थी जिसमें कहा गया था कि जंतर-मंतर शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के लिए सही जगह नहीं है, क्योंकि यहां आने-जाने में दिक्कत होती है, मेडिकल इमरजेंसी की स्थिति में परेशानी हो सकती है और यहां आने वाले लोगों के लिए पीने का पानी और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना मुश्किल होता है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा था। सरकार का जवाब अभी आया नहीं है। दिल्ली हाईकोर्ट के जज की टिप्पणी आ गई है।
है न अद्भुत संयोग! राजनीति में और सरकार के स्तर पर इस तरह का संयोग अक्सर होता रहता है। लेकिन न्यायपालिका के गलियारे से ऐसा संयोग कभी कभी आता है। ऐसे संयोग से ऐतिहासिक परिवर्तन का योग बनता है। यहाँ भी ऐसा संयोग बनने वाला है : लगता है जंतर मंतर से असहज हुई व्यवस्था जिसमें सरकार और न्यायपालिका दोनों शामिल हैं, जंतर मंतर पर ताला लगा देंगे!
दिल्ली आने वाले पर्यटक जब जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा बनवाई गई इस प्राचीन खगोलीय वेधशाला को देखने जायेंगे तो वहाँ के टूर गाइड जंतर मंतर के प्रोटेस्ट साइट को दिखाकर बताएंगे कि पहले यहीं पर प्रोटेस्ट हुआ करता था जिसे सरकार और न्यायपालिका ने मिलकर बंद करा दिया था। क्योंकि यहाँ से उठती आवाजें सिस्टम को असहज करती थीं।
यूं तो जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह ने दिल्ली के अलावा जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में भी जंतर मंतर बनवाया था। लेकिन विरोध प्रदर्शन का प्रतीक बनने का भाग्य दिल्ली के जंतर मंतर को ही मिला था। जंतर मंतर से पहले यह धरना प्रदर्शन बोट क्लब पर हुआ करता था। आज जिस इलाके को कर्तव्य पथ कहा जाता है, वही पहले राजपथ और उससे पहले बोट क्लब के नाम से जाना जाता था। यह इलाका इंडिया गेट से विजय चौक तक फैला हुआ है। आजादी के बाद कई दशकों तक देश के बड़े आंदोलन यहीं आयोजित होते थे। राजनीतिक दल, किसान संगठन, कर्मचारी यूनियन और सामाजिक संगठन अपनी ताकत दिखाने के लिए इसी जगह जुटते थे। इसी वोट क्लब पर 1988 का ऐतिहासिक प्रोटेस्ट हुआ, जब किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में करीब पांच लाख किसान अपने ट्रैक्टरों और मवेशियों के साथ बोट क्लब पहुंचे थे। किसान लगभग एक सप्ताह तक वहीं डटे रहे। उस प्रदर्शन को आज भी देश के सबसे बड़े किसान आंदोलनों में गिना जाता है।
1990 के दशक के बाद सुरक्षा कारणों से बोट क्लब पर बड़े प्रदर्शनों पर रोक लगा दी गई। सरकार का तर्क था कि राष्ट्रपति भवन, संसद और दूसरे महत्वपूर्ण सरकारी भवनों के बेहद करीब इतनी बड़ी भीड़ सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है।इसके बाद जंतर-मंतर को सीमित संख्या में धरना-प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थान के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। धीरे-धीरे यह जगह देशभर के आंदोलनों की पहचान बन गई। अलग-अलग राज्यों से आने वाले संगठन, छात्र, कर्मचारी, किसान और सामाजिक कार्यकर्ता अपनी मांगों को लेकर यहीं धरना देने लगे।
जंतर मंतर कई आंदोलनों का गवाह रहा है। उनमें 2011 का अन्ना हजारे की अगुवाई वाला लोकपाल आंदोलन प्रमुख है। इसी आंदोलन के बाद अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी अस्तित्व में आई थी। 2012 में निर्भया को न्याय दिलाने में जंतर मंतर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 2917 में तमिलनाडु के सैकड़ों किसानों ने यहीं रहकर प्रदर्शन किया था, जिसकी चर्चा पूरे देश में हुई थी। जंतर मंतर CAA प्रोटेस्ट का भी गवाह बना। कुश्ती संघ के तत्कालीन अध्यक्ष ब्रज भूषण शरण सिंह के खिलाफ जब महिला पहलवानों ने कथित यौन शोषण का आरोप लगाया था। इसी जंतर मंतर पर प्रोटेस्ट हुआ था। जंतर मंतर गवाह उस घटना का भी गवाह बना जब अंतर्राष्ट्रीय मंच पर देश को गौरवान्वित करने वाली महिला पहलवानों को पुलिस ने घसीटा था। लेकिन नीट पेपर लीक को लेकर जंतर मंतर पर हुए कॉकरोच प्रोटेस्ट ने जो किया, इससे पहले जंतर मंतर से कभी नहीं हुआ था। हमारी सरकार में इस्तीफे नहीं होते का उद्घोष करने वाली सरकार के शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। जंतर मंतर ने सबसे मजबूत कहे जाने वाली सरकार को घुटने पर टेकने के लिए मजबूर कर दिया।
मज़बूत शासकों को चुनौती देने वालों को विरोध की क़ीमत चुकानी ही पड़ती है। चाहे वो राजतंत्र हो या लोकतंत्र! क्योंकि सत्ता का अपना चरित्र होता है, सत्ता को विरोध का स्वर पसंद नहीं होता।
जंतर मंतर मौन नहीं हो सकता! क्योंकि जंतर मंतर विरोध का स्वर है जो कहीं से भी उभर सकता है।
जंतर मंतर को मौन करने की कोशिश हो रही है। लेकिन जंतर मंतर मौन नहीं हो सकता! क्योंकि जंतर मंतर विरोध का स्वर है जो कहीं से भी उभर सकता है। दिल्ली का रामलीला मैदान हो या राँची का जयपाल मुंडा स्टेडियम! देश में जबतक लोकतंत्र है जंतर मंतर विरोध का नारा बुलंद करता रहेगा।