अजीत भारती को अग्रिम जमानत नहीं
सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर अजीत भारती को दिल्ली की अदालत ने अग्रिम जमानत देने से मना कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अजीत भारती के द्वारा चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ के संबंध में प्रयोग की गई भाषा में caste hierarchy, caste-based notions of purity मतलब जाति आधारित शुद्धता की अवधारणा और विवाह तथा वंश के मामलों में तथाकथित ‘ऊंची’ जातियों को ‘नीची’ जातियों से श्रेष्ठ मानने की सोच झलकती है।
अदालत ने माना कि अजीत भारती के खिलाफ प्रथम दृष्टया SC/ST Act का मामला बनता है। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि SC/ST Act की धारा 3(1)(r) के तहत अपराध के जरूरी तत्व बनते हैं। और चूंकि SC/ST Act मामले में अग्रिम जमानत देने का प्रावधान नहीं है, इसलिये अजीत भारती को अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती। इसलिए कोर्ट ने अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया।
एडिशनल सेशन जज सौरभ प्रताप सिंह ललर ने अपने आदेश में ये भी कहा कि अगर मामला SC/ST Act के तहत अपराध का नहीं होता, तो अजीत भारती को अग्रिम जमानत दी जा सकती थी।
एडिशनल सेशन जज ने अपने फैसले में ये भी कहा कि अजीत भारती ने जो कुछ बोला है वह किसी टिप्पणी के जवाब में हुई एक अचानक और तत्काल प्रतिक्रिया जैसी प्रतीत होती है और मामले में हिरासत में लेकर पूछताछ की जरूरत नहीं थी।
अजीत भारती ने जो कुछ बोला है वह किसी टिप्पणी के जवाब में हुई एक अचानक और तत्काल प्रतिक्रिया जैसी प्रतीत होती है : एडिशनल सेशन जज
कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां केवल अग्रिम जमानत की याचिका पर फैसला करने तक सीमित हैं। इससे फिलहाल यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अजीत भारती दोषी हैं या निर्दोष हैं। अदालत ने न तो आरोपों की सच्चाई पर अंतिम फैसला दिया है और न ही रिकॉर्डिंग के पूरे संदर्भ पर कोई अंतिम निष्कर्ष निकाला है।
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अग्रिम जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट का क्या है फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने किरण बनाम राजकुमार जीवन राज जैन के मामले में 1 सितंबर 2025 को दिए अपने फैसले में कहा था कि SC/ST एक्ट की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर सामान्य तौर पर पूरी तरह रोक है। यानी इस कानून के तहत आरोपी व्यक्ति CrPC की धारा 438 के तहत आम तौर पर गिरफ्तारी से पहले जमानत नहीं मांग सकता।
लेकिन उसी फैसले में कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण अपवाद भी बताया था !
अगर FIR को पहली नजर में पढ़ने पर ही यह साफ हो जाए कि SC/ST एक्ट के तहत कोई प्रथमदृष्टया मामला नहीं बनता और आरोप पूरी तरह निराधार हैं, तो अदालत अग्रिम जमानत देने पर विचार कर सकती है – सुप्रीम कोर्ट ।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि चुनाव में एक खास उम्मीदवार को वोट नहीं देने पर उसके और उसके परिवार के साथ मारपीट की गई, जातिसूचक गालियां दी गईं और धमकाया गया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने अप्रैल 2025 में आरोपियों को अग्रिम जमानत दे दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘स्पष्ट कानूनी भूल’ बताते हुए रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अदालत अग्रिम जमानत के चरण में मिनी ट्रायल नहीं कर सकती, सबूतों का विस्तृत मूल्यांकन नहीं कर सकती और गवाहों की विश्वसनीयता नहीं परख सकती।
अजीत भारती के मामले में अदालत ने कहा है कि उनके खिलाफ़ प्रथम दृष्टया SC-ST एक्ट का अपराध बनता है। इसलिए अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती। लेकिन कोर्ट की यह टिप्पणी कि अजीत भारती ने जो कुछ बोला है वह किसी टिप्पणी के जवाब में हुई एक अचानक और तत्काल प्रतिक्रिया जैसी प्रतीत होती है, ट्रायल के पक्ष में जा सकती है।