सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार (10 जुलाई) जो हुआ, पूरे देश ने देखा। क्योंकि न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति समेत बाकी मामलों में पारदर्शिता भले ही दूर की कौड़ी हो, कोर्ट की कार्यवाही में पारदर्शिता तो आ ही गई है। आजकल सुनवाई के दौरान जो कुछ होता है, सबकुछ दिखता है। सरकार के वकील क्या कहते हैं, जजों की टिप्पणी क्या होती है और वकीलों की गाली और जजों के साथ दुर्व्यवहार भी! इसलिए जब एक वकील ने भरी अदालत में जजों को आदेश दिया कि -“मिस्टर ज्यूडिशियल सर्वेंट्स! आई ऑर्डर यू टू रजिस्टर FIR…!” इस घटना को पूरे देश ने देखा और सुना। देश ही क्यों, इंटरनेट के दौर की दुनिया सिमट गई है, पूरी दुनिया ने देखा होगा!
लोगों ने ये भी देखा कि प्रबल प्रताप नाम के इस वकील ने किस तरह जस्टिस के वी विश्वानाथन और जस्टिस आलोक आराधे को संबोधित करते हुए कहा कि बोल देना … “बीप बीप.. चीफ जस्टिस को..!” उसका आंदाज बॉलीवुड की फ़िल्म ‘मेरे अपने’ के नायक शत्रुघ्न सिन्हा से कहीं अधिक आक्रामक था – ‘…कह देना, ‘छेनू आया था!’
प्रबल प्रताप वकील हैं। कोर्ट को संबोधित कैसे किया जाता है, उन्हें जरूर पता होगा! हर बात में माई लॉर्ड, कोर्ट से राहत मिली तो भी माई लॉर्ड, नहीं मिली तो भी माई लॉर्ड, डांट पड़ी तो भी माई लॉर्ड! लेकिन प्रबल प्रताप ने एक बार भी अपने मुँह से माई लॉर्ड शब्द नहीं बोला। मानो तय करके आए हों, माई लॉर्ड तो किसी हाल में नहीं बोलना है! उन्होंने जजों पर पेपर उछाले और जजों को ‘मिस्टर ज्यूडिशियल सर्वेंट्स’ संबोधित किया! कुछ लोगों को यह संबोधन बहुत अच्छा लग रहा है। बात तो सही है। जिस देश के प्रधानमंत्री खुद को प्रधान सेवक कहते हों, वहां जजों को ज्यूडिशियल सर्वेंट कहने में क्या समस्या है! सोशल मीडिया पर खूब तालियां बज रही हैं!
बहुत लोगों ने देश की सबसे बड़ी अदालत में घटी इस घटना को न्यायिक अव्यवस्था से उपजी हताशा बताया, कुछ लोगों को उस वकील में भगत सिंह का अक्श दिख रहा है। लोगों को लगता है कि “बहरे कानों को सुनाने के लिए धमाकों की जरूरत पड़ती है।”लेकिन क्या यह सच है ? अगर यह सच भी है तो क्या न्यायिक अव्यवस्था से उपजी हताशा के नाम पर इस तरह की घटना को जस्टिफाई किया जा सकता है ?
प्रबल प्रताप कौन हैं?
इस सवाल का जवाब देने से पहले, प्रबल प्रताप की पृष्ठभूमि और उस मामले को जानना जरूरी है जिसे लेकर वह अदालत आए थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रबल प्रताप उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के रहने वाले हैं। वह लखनऊ के एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करते थे। आरोप है कि प्रबल प्रताप ने अपने दफ्तर में एक महिला सहकर्मी को परेशान किया था। कंपनी ने जांच कराई तो पता चला कि उन्होंने कथित तौर पर महिला सहकर्मी को आपत्तिजनक मेल और संदेश भेजे थे। उन्हें दफ्तर में भी दुर्व्यवहार का दोषी पाया गया। पहले तो सख्त चेतावनियां दी गईं लेकिन जब सुधार नहीं हुआ तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया।
नौकरी से निकाले जाने के बाद प्रबल प्रताप ने कंपनी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। कंपनी पर केस-मुकदमे कर दिए। उस पर ‘देश विरोधी गतिविधियों’ में शामिल रहने का आरोप भी लगाया। इन्हीं आरोपों पर वो कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग करते हुए कोर्ट गए थे। उन्होंने लखनऊ की सीजेएम कोर्ट में कंपनी के खिलाफ देशविरोधी काम करने की एफआईआर दर्ज कराने के लिए अर्जी डाली। कोर्ट ने पुलिस से रिपोर्ट तलब की. पुलिस रिपोर्ट प्रतिकूल आने पर कोर्ट ने इसी साल 26 फरवरी को प्रबल से अपने आरोपों की पुष्टि के सबूत मांगे। सबूत तत्काल नहीं मिलने पर कोर्ट ने मामले को पुलिस एफआईआर के बजाय सीधे ‘कम्प्लेंट केस’ यानी निजी शिकायत के रूप में दर्ज कर लिया।
करीब महीने भर बाद 6 अप्रैल को प्रबल प्रताप को इस मामले में कोर्ट के सामने सबूत पेश करने थे लेकिन कथित तौर पर पुलिस पर एफआईआर दर्ज करने का दबाव बनाते हुए प्रबल ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में भी अपील दायर कर दी। उनकी दलील थी कि कम्प्लेंट केस रद्द कर सीधे एफआईआर का आदेश दिया जाए। हाईकोर्ट ने उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि जब निचली अदालत मामले की सुनवाई कर रही है तो कानून के मुताबिक वहीं तथ्य रखे जाएं। हाईकोर्ट से निराश होकर प्रबल सुप्रीम कोर्ट आए और यहां उन्होंने जो किया उसकी चर्चा आज पूरे देश में हो रही है। कम से कम इस केस के तथ्य में न्यायपालिका में अव्यवस्था से उपजी हताशा तो कहीं दिखाई नहीं दे रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रबल खिलाफ अवमानना या कोई सख्त एक्शन न लेने का फैसला किया है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की हालत देखते हुए अदालत उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करना चाहती। जहां तक इस मामले के मेरिट्स का सवाल है, अदालत ने सभी रिकॉर्ड देखे हैं।अदालत को निचली अदालत के फैसले या आदेश में दखल देने का कोई ठोस कारण नहीं मिला।
यह कोई पहली घटना नहीं है!
फिर सवाल उठता है कि प्रबल प्रताप ने ऐसा क्यों किया होगा ? इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए हमें पिछले साल तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गवई के ऊपर जूता फेंकने वाली घटना को याद करना होगा। 6 अक्टूबर 2025 को पूर्व चीफ जस्टिस गवई की अदालत में भी अभूतपूर्व घटना घटी थी। राकेश किशोर नाम के एक अधेड़ उम्र वकील ने सुनवाई के दौरान ‘सनातन का अपमान नहीं सहेंगे’ के नारे लगाते हुए जस्टिस गवई की ओर जूता उछालने की कोशिश की थी। वह वकील जस्टिस गवई की एक टिप्पणी से आहत था। मध्य प्रदेश के एक मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति के पुनर्निर्माण की याचिका को खारिज करते हुए जस्टिस गवई बोल दिया था कि ने कहा था कि – ‘जाइए और स्वयं देवता से कुछ करने के लिए कहिए।’ राकेश किशोर को यह बात बुरी लगी थी कि जस्टिस गवई ने ‘न केवल प्रार्थना स्वीकार करने से इनकार कर दिया, बल्कि भगवान विष्णु का मजाक भी उड़ाया था।’
जस्टिस गवई पर जूता फेंकने के बाद वह वकील रातोंरात प्रसिद्ध हो गया था। सभी न्यूज चैनलों पर उसका इंटरव्यू प्रसारित हुआ। उसे अपने किए पर कोई पछतावा नहीं था। कुछ लोगों ने उस घटना को सेलिब्रेट किया था और राकेश किशोर को सनातन संस्कृति का रक्षक बताया। उस मामले में भी कोर्ट ने वकील को माफ कर दिया था। तत्काल प्रसिद्धि का इससे बेहतर तरीका और क्या हो सकता है जिसमें किसी तरह की सजा का भय न हो ! प्रबल प्रताप ने भी प्रसिद्धि पाने का वही रास्ता अपनाया। उसमें लोग भगत सिंह का अक्श देख रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट में 2009 में एक ऐसी घटना और घटी थी। कोर्ट नंबर 3 में जस्टिस अरिजीत पसायत और न्यायमूर्ति अशोक कुमार गांगुली की पीठ मुंबई के BOSS (Bombay Organisation for Social and Spiritual Services) School of Music से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर रही थी। इसी दौरान स्कूल से जुड़े कुछ सदस्य अचानक उत्तेजित हो गए और जस्टिस अरिजीत पसायत की ओर चप्पल फेंक दी। चप्पल जज को नहीं लगी, लेकिन इस घटना से अदालत की कार्यवाही कुछ समय के लिए बाधित हो गई। घटना के तुरंत बाद आरोपित महिलाओं और उनके साथ मौजूद एक पुरुष ने अदालत के भीतर जजों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां भी कीं थी। जस्टिस पसायत ने इसे अदालत की गरिमा पर सीधा हमला और न्यायालय की अवमानना माना और सज़ा सुनाई थी।
इसमें कोई दो राय नहीं कि न्यायिक व्यवस्था मे कमियाँ हैं। अदालतों में लंबित मामलों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। आम आदमी के लिए न्याय पाना दुसाध्य होता जा रहा है। अदालतों में तारीख़ पर तारीख़ से लोग दुःखी हैं। जरूरी मामलों पर सुनवाई के लिए जजों के पास समय नहीं है। ऐसे में लोगों मे न्यायिक व्यवस्था के प्रति हताशा बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन हताशा की आड़ में इस तरह की घटनाओं को जस्टिफाई करना ने केवल न्यायिक व्यवस्था के लिए बल्कि हमारी पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक हो सकता है।