‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड ‘(Justice delayed is justice denied ) आपने भी क़िताबों में पढ़ा होगा। इसका अर्थ है न्याय में देरी, न्याय से वंचित करना है। कोर्ट रिपोर्टिंग के दौरान, देश की सबसे बड़ी अदालत से मुझे भी कई बार इस तरह की टिप्पणी सुनने को मिली है। ज्यूडिशरी से जुड़े सेमिनार में, अदालतों में पेंडेंसी की समस्या पर जहाँ कहीं भी चर्चा होती है, इस क़ानूनी सिद्धांत के बिना चर्चा पूरी ही नहीं होती। ‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड’ का यह आज सिद्धांत पूरी दुनिया को न्याय व्यवस्था का मार्गदर्शन करता है।
लेकिन विडंबना यह है कि इस सिद्धांत को बार-बार दोहराने वाली देश की सर्वोच्च अदालत के एक हालिया फैसले ने न्यायिक देरी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में गैर-इरादतन हत्या (Culpable Homicide Not Amounting to Murder) से जुड़े एक आपराधिक मामले में लगभग 14 वर्ष बाद अंतिम फैसला सुनाया। इस बीच, फैसला आने तक न्याय की आस लगाए तीन दोषियों में से दो की मौत हो चुकी थी। यानी जिन्होंने देश की सबसे बड़ी अदालत से अंतिम न्याय की उम्मीद में अपील दायर की थी, वे फैसला सुनने से पहले ही स्वर्ग सिधार गए।
केस के रिकॉर्ड के अनुसार, पाँच सौ रुपये की घड़ी खरीद बिक्री के दौरान ग्राहक और दुकानदार में झगड़ा हुआ। लड़ाई झगड़े में दुकानदार पास के सूखे नाले में गिर गया और उसकी मौत हो गई। घटना 1997 की है। ट्रायल कोर्ट ने 5 साल में फैसला सुना दिया। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने निचली अदालत के खिलाफ अपील पर फैसला करने में दस साल लगा दिए। दोषियों ने अपनी सजा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। लेकिन अंतिम सुनवाई और निर्णय आने में लगभग डेढ़ दशक का समय लग गया। इस बीच दो अपीलकर्ताओं का निधन भी हो गया। कोर्ट ने अंततः अपील का निस्तारण किया, लेकिन दो लोगों के लिए यह फैसला केवल न्यायिक रिकॉर्ड बनकर रह गया।
न्यायिक देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट स्वयं कई बार चिंता व्यक्त कर चुका है। हाल ही में भारत के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने तो ‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड’ से भी आगे बढ़कर कहा था कि ‘Justice delayed is justice destroyed’ , यानी न्याय में देरी, न्याय को ही नष्ट कर देती है। ऐसे में यह मामला एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि जब सर्वोच्च अदालत में ही किसी आपराधिक अपील के निपटारे में 14 वर्ष लग जाएँ, तो आम नागरिक समय पर न्याय की उम्मीद कैसे करे?
न्याय में देरी का असर पीड़ित और अभियुक्त, दोनों पर पड़ता है।
न्याय मिलने में देरी केवल अभियुक्तों को ही नहीं, बल्कि पीड़ित परिवारों को भी प्रभावित करती है। वर्षों तक मुकदमा लंबित रहने से दोनों पक्ष मानसिक, सामाजिक और आर्थिक दबाव झेलते हैं। न्याय का उद्देश्य केवल सही फैसला देना नहीं, बल्कि समय पर फैसला देना भी है।
‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड’ कहाँ से आया ?
इस वाक्यांश का श्रेय सामान्यतः ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम इवार्ट ग्लैडस्टोन (William Ewart Gladstone) को दिया जाता है। उन्होंने 1868 में कहा था: “Justice delayed is justice denied.” हालाँकि, इस विचार की जड़ें इससे भी पुरानी हैं।
13वीं शताब्दी में हेनरी डी ब्रेकटन (Henry de Bracton) ने लिखा था कि न्यायाधीशों को न्याय देने में अनावश्यक देरी नहीं करनी चाहिए। बाद में 1215 के Magna Carta के अनुच्छेद 40 में भी यह सिद्धांत मिलता है:
“To no one will we sell, to no one will we deny or delay right or justice.” अर्थात, हम किसी को भी न्याय न बेचेंगे, न उससे इनकार करेंगे और न ही न्याय में देरी करेंगे। ‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड’ सिद्धांत आज पूरी दुनिया को न्याय व्यवस्था का मार्गदर्शन करता है।