आजकल SC ST एक्ट के बारे में बहुत बातें हो रही हैं । ऐसे में आपके मन में भी बहुत से सवाल होते सकते हैं कि यह एससी- एसटी कानून है क्या ? यह कानून कब लगता है? क्या हरिजन एक्ट के अपराध मे जमानत मिल सकती है ? इस कानून के तहत झूठी शिकायत से कैसे बचा जा सकता है ? SC ST एक्ट के पीड़ितों के लिए मुआवजे का क्या प्रावधान है? कब और कितना मिलता है मुआवजा। आइए इन सभी सवालों का जवाब जानने की कोशिश करते हैं।
सबसे पहले समझते हैं कि ये एससी/एसटी एक्ट क्या है:
एससी/एसटी एक्ट का पूरा नाम है अनुसूचित जाति – अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989। इसे हरिजन एक्ट के नाम से भी जानते हैं। अनुसूचित जातियों और जनजातियों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए इस कानून को बनाया गया था।
इस एक्ट का उद्देश्य सिर्फ सज़ा देना ही नहीं, बल्कि पीड़ितों को न्याय, मुआवज़ा और पुनर्वास दिलाना भी है।
एससी/एसटी कानून 11 सितंबर 1989 को पारित हुआ और 30 जनवरी 1990 से लागू हुआ। 1950 में जब भारत का संविधान लागू हुआ तो उसके बाद भी कुछ वर्गों के लोग अपने अधिकारों से वंचित रह गए थे। वे लोग लगातार सामाजिक भेदभाव व अत्याचार का शिकार हो रहे थे। इसलिए यह कानून लाया गया था। पहले यह कानून जम्मू कश्मीर में लागू नहीं था अब वहां भी लागू हो गया है।
SC/ST ACT के तहत अनुसूचित जाति – जनजाति माना किसे जाता है?
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति यानि SC और ST भारत में ऐतिहासिक रूप से वंचित और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के सदस्य हैं जिन्हें भारत सरकार द्वारा उनके सामाजिक-आर्थिक विकास और भेदभाव से सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नामित किया गया है।
हमारा संविधान 1,108 जातियों को अनुसूचित जाति की मान्यता देता है जो देश की आबादी के लगभग 16.6% हैं। अनुसूचित जनजाति भारत में स्वदेशी समुदाय हैं जिनकी विशिष्ट सांस्कृतिक, भाषाई और सामाजिक पहचान है। उन्हें ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रखा गया है और अक्सर गैर-आदिवासी समुदायों द्वारा उनका शोषण और विस्थापन किया जाता है। हमारा संविधान कुल 705 तरह की जनजातियों को मान्यता देता है, जो देश की आबादी के लगभग 8.6% हैं।
एससी-एसटी एक्ट यानी हरिजन एक्ट कब लगता है
एससी/एसटी एक्ट उस व्यक्ति पर लगता है जो अनुसूचित जाति जनजाति समुदाय के किसी व्यक्ति के साथ जाति के आधार पर भेदभाव, अपमान, हिंसा या अत्याचार करता है। यहाँ ये जानना जरूरी है कि SC ST का मुकदमा केवल नॉन SC ST जातियों के ख़िलाफ़ ही दर्ज होता है। मतलब अगर SC ST व्यक्ति किसी
SC ST व्यक्ति के साथ गाली गलौज, मारपीट करता है तो यहाँ SC ST act नहीं लगेगा।
SC/ST एक्ट के तहत कब केस दर्ज कराया जा सकता है
STS-कोई आदमी SC-ST वर्ग के किसी सदस्य को कुछ ऐसी वस्तु खिलाने के लिए मजबूर करता है जो खाने-पीने योग्य न हो। SC /ST एक्ट का मामला बन जाता है
-अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग की किसी महिला का अनादर करने या उसकी लज्जा को भंग करने के आशय से हमला या बल प्रयोग करना।
-इस समुदाय के किसी सदस्य को अपना मकान, गांव या अन्य निवास स्थान छोड़ने के लिए मजबूर करना।
– एसटी एससी वर्ग के किसी व्यक्ति का सामाजिक रुप से बहिष्कार कर देने पर।
– किसी SC- व्यक्ति को जाति के नाम पर नौकरी या काम न देने पर।
– सार्वजनिक जगहों जैसे मंदिर, हस्पताल, स्कूल आदि में जाने से रोकने की कोशिश करने पर।
– वोट देने के अधिकार से रोकना या जबरदस्ती बल का प्रयोग कर अपने किसी खास व्यक्ति को वोट देने के लिए मजबूर करना।
– किसी व्यक्ति के जबरदस्ती कपड़े उतरवाकर उसे नीचा दिखाने के लिए नंगा करने पर या समाज में उसका मजाक उड़ाने के लिए किसी व्यक्ति के चेहरे पर काले रंग से कालिख पोत देने पर।
– लोगों के सामने कोई भी कारण बनाकर अपमानित करने पर भी SC ST एक्ट लग सकता है।
एससी-एसटी एक्ट से जुड़े मामलों के लिए विशेष अदालतों की व्यवस्था की गई है. विशेष अदालतें प्रत्येक राज्य में बनी हुई है। ताकि ऐसे मामलों मे जल्द से जल्द कार्यवाही की जा सकें।
सज़ा का प्रावधान
अगर कोई व्यक्ति SC/ST एक्ट के तहत दोषी पाया जाता है तो उसके लिए छह महीने से लेकर उम्रकैद तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
SC/ST एक्ट से जुड़े मामले में जमानत बहुत मुश्किल है। अगर एससी-एसटी एक्ट के तहत किसी व्यक्ति के खिलाफ केस दर्ज होता है तो यह एक संज्ञेय श्रेणी का अपराध माना जाता है। SC/ST एक्ट में पहले अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं था। लेकिन अब ऐसी व्यवस्था हो गई है कि अगर मजिस्ट्रेट को लगता है कि केस बनावटी है तो अग्रिम जमानत मिल सकती है। लेकिन यह इतना भी आसान नहीं होता।
मुआवजे का प्रावधान
SC/ST एक्ट के तहत FIR दर्ज कराने वाले को मुआवजा मिलता है। यह रकम, अपराध की गंभीरता के मुताबिक पचासी हज़ार से लेकर सवा आठ लाख तक हो सकता है। सरकार मुआवजे की रकम 40 फीसदी बढ़ाने पर विचार कर रही है। बढ़ने के बाद न्यूनतम 1 लाख और अधिकतम 12 लाख हो जाएगा।
मुआवजे का भुगतान केस के अलग अलग स्टेज में किश्तो में होता है। मसलन 25 फीसदी पैसे FIR दर्ज होने पर, 50 फीसदी रकम चार्जशीट दायर होने पर, बाक़ी का 25 फीसदी फैसला आने के बाद।
यह मुआवजे की यह रकम अपराध करने वाले से नहीं लिया जाता, बल्कि सरकारी धन से दिया जाता है।
एससी एसटी एक्ट का दुरुपयोग
हाल के दिनों में इस तरह की घटनाएं अधिक रिपोर्ट हुई हैं जिसमें मुआवजे के लिए SC ST एक्ट का फ़र्जी मुकदमा दर्ज कराया गया था। कुछ ही दिन पहले ख़बर आई थी कि उत्तर प्रदेश के झाँसी के वकील और उसके परिजनों को इस एक्ट के तहत 23 लाख से अधिक मुआवजे का भुगतान हुआ था और अभी भी उनके द्वारा दायर किए गए SC/ST के दस से बारह मामले लंबित हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में जांच का आदेश दिया है।
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हालांकि इस कानून का मुख्य उद्देश्य SC/ST समुदाय के लोगों के खिलाफ अत्याचार और भेदभाव को रोकना है। लेकिन कुछ, ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जहां इस एक्ट का दुरुपयोग किया गया है।
– कई बार बदला लेने या व्यक्तिगत दुश्मनी निपटाने के इरादे से SC/ ST एक्ट के तहत केस कर दिया जाता है।
– कई बार जमीन और संपत्ति विवादों को निपटाने के लिए भी इसका दुरुपयोग किया जाता है। गैर-अनुसूचित जाति/जनजाति समुदायों के व्यक्तियों पर उनकी जमीन या संपत्ति हड़पने के लिए झूठे आरोप लगाए जाते हैं।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इस तरह का दुरुपयोग न केवल निर्दोष व्यक्तियों को नुकसान पहुंचाता है बल्कि SC/ST एक्ट के उद्देश्य को भी कमजोर करता है। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि इस एक्ट को निष्पक्ष और न्यायपूर्ण तरीके से लागू किया जाए और झूठे मामलों से सख्ती से निपटा जाए।
इस क़ानून के बढ़ते दुरुपयोग को रोकने के लिए 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ व्यवस्था दी थी। मोदी जी की सरकार ने संसद से कानून बनाकर उस व्यवस्था को रद्द कर दिया था।