मेधा रूपम,नोएडा DM: निरंकुश रवैया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की कानून की छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत को रद्द करते हुए उत्तर प्रदेश की नौकरशाही और पुलिस के कामकाज पर गंभीर टिप्पणी की है। हाइकोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि नोएडा में श्रमिकों के प्रोटेस्ट के दौरान नोएडा की DM मेधा रूपक और अन्य अधिकारियों का निरंकुश रवैया था अगर राज्य में अधिकारियों का रवैया ऐसा ही जारी रहा तो उत्तर प्रदेश को एक ओरवेलियन डिस्टोपियाl में बदलने में देर नहीं लगेगी।
क्या है ओरवेलियन डिस्टोपिया
ओरवेलियन डिस्टोपिया का मतलब ऐसा भयावह और दमनकारी समाज, जहाँ सत्ता.. लोगों की निगरानी, सूचना पर नियंत्रण, प्रचार, झूठ और डर के जरिए नागरिकों की सोच और व्यवहार को नियंत्रित करती है। Orwellian dystopia शब्द George Orwell के उपन्यास Nineteen Eighty-Four (1984) से आया है।
हाईकोर्ट का यह फैसला 2 सितंबर का है लेकिन लिखित आदेश सोमवार को आया है। अपने 15 पेज के फैसले में जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने लिखा है कि आकृति चौधरी की NSA के तहत लगातार हिरासत उनके संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। आकृति चौधरी को हिरासत में रखने का आदेश मनमाना था। आकृति के खिलाफ कोई सबूत नहीं था।
कोर्ट ने आकृति को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया है और साथ ही निर्देश दिया है कि इस रकम की वसूली गौतम बुद्ध नगर की तत्कालीन जिलाधिकारी मेधा रूपम और मामले के लिए जिम्मेदार अन्य अधिकारियों के वेतन से की जाए, यहां तक कि SHO की भी जिम्मेदारी तय करने को कहा गया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नौकरशाही और पुलिस की भूमिका पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है । कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों को व्यापक शक्तियां इसलिए दी जाती हैं क्योंकि उनसे नागरिकों के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों, गरिमा, सम्मान और कल्याण की रक्षा की अपेक्षा होती है।
अधिकारियों को यह याद रखना चाहिए कि उनकी निष्ठा संविधान के प्रति है, राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति नहीं। लोकतंत्र में अधिकारी जनता के सेवक हैं और जनता ही वास्तविक मालिक हैं – इलाहाबाद हाईकोर्ट।
साथ ही कोर्ट ने चेतावनी दी कि जब नौकरशाह और पुलिस अधिकारी अपनी शपथ को नजरअंदाज करते हुए उसके विपरीत काम करते हैं तो लोगों में उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य के दमनकारी अवशेष के रूप में देखने की भावना पैदा हो सकती है। इससे सामाजिक अशांति और असंतोष का वातावरण बन सकता है।
हाईकोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम द्वारा पारित NSA हिरासत आदेश के तरीके पर विशेष रूप से नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि जब पुलिस की रिपोर्ट में केवल आरोप हों और उनके समर्थन में विश्वसनीय सामग्री न हो तो जिलाधिकारी का कर्तव्य था कि वह पूरे रिकॉर्ड की बारीकी से जांच करतीं और उसके बाद यह तय करतीं कि NSA जैसे कठोर कानून को लागू करने की वास्तव में जरूरत है या नहीं।
कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि आकृति एक महिला छात्रा और एक्टिविस्ट थीं, उनका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और उपलब्ध सामग्री से यह साबित नहीं होता था कि उन्होंने हिंसा के लिए लोगों को उकसाया था।
नोएडा में श्रमिकों के प्रदर्शन के संदर्भ में कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल घर या बंद कमरे तक सीमित नहीं है। इसमें लोगों का सार्वजनिक स्थानों पर आना, शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होना और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना भी शामिल है।
वीडियो देखें :
कोर्ट ने चेतावनी दी कि केवल शांति भंग होने की आशंका के आधार पर लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर इकट्ठा होने या अपने अधिकारों के लिए प्रदर्शन करने से रोकना उचित नहीं है। कोर्ट ने कहा कि केवल शांति भंग होने की आशंका के आधार पर लोगों के शांतिपूर्ण अधिकारों को रोकना ऐसा है जैसे समस्या से बचने के लिए पूरा अधिकार ही खत्म कर दिया जाए।
कोर्ट ने कहा कि संविधान सामूहिक अभिव्यक्ति के इस अधिकार की रक्षा करता है और इसे केवल राज्य की सब्जेक्टिव ओपिनियन के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।
चुनाव से ठीक पहले उत्तर प्रदेश के ब्यूरोक्रेसी को लेकर हाईकोर्ट की यह टिप्पणी सरकार को असहज करेगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि अधिकारियों के रवैये में बदलाव होगा और अधिकारी जनता को मालिक न सही कम से कम नागरिक जरूर समझेंगे।