देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई ने निचली अदालतों और हाईकोर्ट के द्वारा जमानत की याचिकाओं को खारिज़ करने पर चिंता जताया है। सीजेआई जस्टिस गवई ने सुप्रीम कोर्ट के लेजेंडरी जज जस्टिस वीआर कृष्णा अय्यर के न्यायिक योगदान पर बाते करे थे। इसी दौरान उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में अदालतें जस्टिस कृष्णा अय्यर के द्वारा प्रतिपादित न्यायिक सिद्धांत ‘बेल इज रूल, जेल इज एक्सेप्शन’ की अनदेखी कर रही हैं। जस्टिस गवई ने कहा कि कुछ समय से अदालतें ‘बेल इज रूल, जेल इज एक्सेप्शन’ के न्यायिक सिद्धांत को भूल गई हैं। अदालतें इस सिद्धांत को अनदेखा कर रही हैं। उन्होंने दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और भारत राष्ट्र समिति (BRS) नेता के कविता के मामले का जिक्र करते हुए कहा कि इन लोगों को लंबे समय तक जेल में रहने के बाद पिछले साल बेल मिली थी और कोर्ट ने इसी सिद्धांत का हवाला देते हुए उन्हें जमानत दी थी। जस्टिस गवई जमानत देने वाली बेंच में शामिल थे।
बेल इज रूल, जेल इज एक्सेप्शन
‘बेल नियम है और जेल अपवाद’ इस कानूनी सिद्धांत को सुप्रीम कोर्ट के द्वारा अक्सर उद्धृत किया जाता है। आज से लगभग 48 साल पहले एक ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा इस सिद्धांत को प्रतिपादित किया था। 1977 में ‘राजस्थान राज्य बनाम बलचंद उर्फ बालिया’ मामले में वादी को जमानत देते हुए जस्टिस वी आर कृष्णा अय्यर ने अपने फैसले में इसे लिखा था। उसके बाद यह एक स्थापित न्यायिक सिद्धांत बन गया है जिसे कई मामलों में अदालतों द्वारा उद्धृत किया जाता रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2G स्पेक्ट्रम मामले में नवंबर 2011 के फैसले में संजय चंद्रा सहित पांच आरोपियों को जमानत देते समय इस सिद्धांत को दोहराया और कहा कि सुप्रीम कोर्ट बार-बार यह कह चुका है कि ‘बेल इज रूल, जेल इज एक्सेप्शन’। 2019 में INX मीडिया मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम को जमानत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आर्थिक अपराध गंभीर हो सकते हैं, लेकिन जमानत से जुड़ा सिद्धांत यही है कि बेल देना नियम है और इनकार करना अपवाद, ताकि आरोपी निष्पक्ष सुनवाई का लाभ ले सके।
पिछले साल प्रबीर पूरकायस्थ, मनीष सिसोदिया और के कविता के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने ‘बेल इज रूल, जेल इज एक्सेप्शन’ के सिद्धांत को दोहराया था। प्रबीर पूरकायस्थ को दिल्ली पुलिस ने अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रीवेंशन) एक्ट (UAPA) के तहत गिरफ्तार किया था। के कविता और मनीष सिसोदिया को दिल्ली के आबकारी नीति घोटाला मामले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में गिरफ्तार किया गया था। के कविता पांच महीने बाद जमानत पर रिहा हुई थीं। वहीं, मनीष सिसोदिया को 17 महीने जेल में रहने के बाद बेल मिली थी। ये दोनों दिल्ली के शराब नीति घोटाला मामले में जेल में बंद थे। इन मामलों में ट्रायल शुरू होने में देरी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ईडी और सीबीआई दोनों केस में जमानत दे दी थी।
हालांकि, कुछ अवसरों पर अदालतों ने यह भी कहा कि यह सिद्धांत हर मामले में समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता। दिल्ली दंगा के साजिश के आरोपी उमर खालिद और शारजील इमाम UAPA के तहत पिछले पांच साल से तिहाड़ जेल में बंद हैं और आज भी जमानत का इंतजार कर रहे हैं।
प्रबीर पुरकायस्थ को जब uapa मामले में बेल मिली , उसी सिद्धांत पर के बेल देना नियम है इंकार अपवाद! फिर उमर खालिद शरजील इमाम, फातिमा जैसे लोगों पे ही या अपवाद वाला कानून फिट बैठता है या मामले राजनीतिक दबाव है?