सूचना का अधिकार कार्यकर्ता की अग्रिम जमानत पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट से ऐसी टिप्पणी आई है जो RTI कानून के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर रही है। सड़क निर्माण का भ्रष्टाचार उजागर करने से जुड़े मामले में RTI कार्यकर्ता राकेश कुमार बहल के खिलाफ सरकारी अधिकारी ने मुकदमा दर्ज करा दिया। राकेश ने अग्रिम जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राकेश कुमार से सवाल पूछ लिया कि आप कौन होते हैं सड़कों के निर्माण की निगरानी करने वाले? क्या आप कोई उच्च प्राधिकारी हैं?
आरोपी राकेश कुमार बहल RTI एक्टिविस्ट हैं। उन्होंने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। उनके वकील ने दलील दिया कि उन्हें झूठा फंसाया गया है क्योंकि उन्होंने सड़क निर्माण कार्य में हुए भ्रष्टाचार को उजागर किया था। प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) के अनुसार, बेहल और एक अन्य आरोपी राजीव कुमार उर्फ मिंटू ने पंजाब के गुरदासपुर जिले के बटाला में चल रहे सड़क निर्माण कार्य में बाधा डाली। उन्होंने उस शिकायतकर्ता को भी धमकाया, जिसके पर्यवेक्षण में कार्य कराया जा रहा था, साथ ही मौके पर मौजूद मजदूरों को भी प्रभावित किया। आरोप है कि उन्होंने मजदूर के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया और शिकायतकर्ता को चोट पहुंचाई। उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धाराओं 304(2), 132, 221, 121(1), 351(2), 351(3) तथा अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 3(1) के तहत मामला दर्ज किया गया। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने 14 मई के अपने आदेश में कहा था कि FIR में लगाए गए आरोप सरकारी कार्य में बाधा डालने में आरोपियों की स्पष्ट और प्रत्यक्ष संलिप्तता दर्शाते हैं, इसलिए उन्हें अग्रिम जमानत देने से इनकार किया गया।
राकेश कुमार बहल को जमानत देना, न देना अदालत पर निर्भर करता है। उसपर सवाल नहीं उठाया जा सकता। लेकिन कोर्ट ने जो टिप्पणी की है, उसके गंभीर संकेत हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सूचना का अधिकार, एक नया व्यवसाय बन गया है।
न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने RTI कार्यकर्ता राकेश कुमार बहल और उनके सहयोगी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए उनके अधिकार पर सवाल उठाया कि वे सड़क निर्माण कार्य की निगरानी किस अधिकार से कर रहे थे?
जस्टिस मेहता ने टिप्पणी की कि RTI एक्टिविज्म अब एक नया व्यवसाय बन गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सड़क निर्माण के लिए केंद्र सरकार ने धन जारी किया है, इसलिए सड़क निर्माण का कार्य वही देखेगी। जस्टिस मेहता के विचारों से सहमति जताते हुए जस्टिस बिश्नोई ने आरोपी से कहा कि ‘आप कौन होते हैं इन सभी सड़कों के निर्माण की निगरानी करने वाले? क्या आप कोई उच्च प्राधिकारी हैं या क्या?’
यहां पर सवाल उठता है कि अगर जनता सरकारी काम की निगरानी कौन करेगा? सरकार पैसा देती है। लेकिन उस पैसे का सदुपयोग हो रहा है या नहीं, यह पूरी तरह सरकार पर छोड़ देना चाहिए? अगर सरकारी धन का खर्च इतना ईमानदारी से होता तब सूचना के अधिकार की जरूरत क्या थी? सूचना का अधिकार कानून इसीलिए तो आया था कि जनता जान सके कि सरकारी धन का उपयोग ठीक से हो रहा है या नहीं! इसी से सरकारी काम के गुणवत्ता की भी निगरानी होती है।
आइए जानते हैं कि ये सूचना का अधिकार कानून क्यों और कैसे आया ?
भारत में सूचना का अधिकार (RTI) किसी उपहार में नहीं, बल्कि एक लंबे जनांदोलन और संघर्ष के बाद मिला। इसे पाने की कहानी बेहद प्रेरणादायक है।
1990 के दशक में राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में मजदूरों को उनका हक और न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलती थी। इसके खिलाफ अरुणा रॉय और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ‘मजदूर किसान शक्ति संगठन’ (MKSS) बनाया। उन्होंने मांग की कि अगर सरकार मजदूरों को पैसे दे रही है, तो उनके पास यह जानने का हक है कि सरकारी रिकॉर्ड में कितना पैसा आया और कितना खर्च हुआ।
इस हक को पाने के लिए कार्यकर्ताओं ने अनोखा तरीका निकाला ‘जनसुनवाई’। गाँवों में सरकारी दस्तावेज (जैसे मस्टर रोल) पढ़कर सुनाए जाते थे, जहाँ लोग खुद बताते थे कि उनके नाम पर फर्जी बिल निकाले गए हैं और उन्हें पैसे नहीं मिले हैं। इस तरह भ्रष्टाचार खुलकर सामने आया। इस जन-दबाव के कारण, 1997 में राजस्थान सरकार को पहला ‘सूचना का अधिकार’ कानून बनाना पड़ा। इसके बाद कई अन्य राज्यों (जैसे महाराष्ट्र, दिल्ली, कर्नाटक) ने भी अपने कानून बनाए।
और अंततः, केंद्र सरकार ने एक मजबूत राष्ट्रीय कानून तैयार किया। संसद ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act 2005) पारित किया। यह ऐतिहासिक कानून पूरे भारत में 12 अक्टूबर 2005 को लागू हो गया।
इस कानून में 2019 में संशोधन किया गया। मूल रूप से RTI अधिनियम, 2005 के तहत, मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त 5 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, पद ग्रहण करते थे तथा उनका वेतन एवं सेवा की शर्तें मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के समान होती थीं। हालाँकि वर्ष 2019 के संशोधन ने इसे बदल दिया, जिससे केंद्र सरकार को उनके कार्यकाल, वेतन, भत्ते और सेवा की शर्तें निर्धारित करने की शक्ति मिल गई।