शरिया कानून की आड़ में नाबालिग लड़कियों की शादी नहीं हो सकती! इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि बाल विवाह निषेध कानून , सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होता है। मुस्लिम पर्सनल ला या शरिया कानून की आड़ में बाल विवाह की अनुमति नहीं दी जा सकती।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि शरिया कानून के तहत बालिग होने से पहले, विवाह की अनुमति देना, बाल विवाह निषेध कानून और नाबालिगों के साथ यौन संबंध बनाने पर रोक लगाने वाले कानून, पॉक्सो का स्पष्ट रूप से उल्लंघन करता है।
“शरिया कानून, जिसमें किसी लड़की के विवाह करने या विवाह कराने के लिए यौवन प्राप्त करने की उम्र निर्धारित की गई है, स्पष्ट रूप से बाल विवाह निषेध कानून और पॉक्सो अधिनियम के विपरीत है।” – इलाहाबाद हाईकोर्ट।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने अपने फैसले में कहा है कि इस मुद्दे पर अलग अलग हाईकोर्ट के अलग-अलग मत हैं। लेकिन कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के 2024 के एक फैसले से सहमति व्यक्त की, जिसमें यह माना गया था कि बाल विवाह कानून द्वारा सभी के लिए निषिद्ध है, चाहे वे किसी भी धर्म का पालन करते हों। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि इससे संबंधित एक मामला पहले सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था लेकिन अभी उसमें फैसला नहीं आया है।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत, यौवन प्राप्त कर चुकी लड़की (जिसे आम तौर पर 15 वर्ष माना जाता है) विवाह के लिए योग्य है। उन्होंने दावा किया कि बाल विवाह निषेध अधिनियम उनके विवाह संबंधी निजी कानून को प्रभावित नहीं करेगा। हाईकोर्ट ने उनके दलीलों को खारिज करते हुए कहा कहा कि धर्म की परवाह किए बिना, प्रत्येक नागरिक के लिए विवाह की आयु बाल विवाह निषेध अधिनियम (पीसीएमए) के तहत निर्धारित आयु है। साथ ही यह भी कहा कि अगर 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति के विवाह की अनुमति दी जाती है तो यह पॉक्सो अधिनियम का उल्लंघन होगा।
अब आइए जान लेते हैं कि मामला क्या था ?
यह मामला बुलन्दशहर का है। पुलिस और चाइल्ड लाइन के अधिकारियों को 15 फरवरी 2026 को एक नाबालिग लड़की के प्रस्तावित विवाह की सूचना मिली। पुलिस और चाइल्ड लाइन के अधिकारी इस शादी को रोकने के लिए उसके घर गए। और उसी समय टीम पर कुछ लोगों ने हमला कर दिया।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक जब अधिकारियों ने बच्ची को बाल कल्याण समिति के समक्ष ले जाने का प्रयास किया तो याचिकाकर्ताओं और कई अन्य लोगों ने पुलिस और चाइल्ड लाइन टीम के साथ दुर्व्यवहार किया और उन्हें धमकाया। यह भी आरोप लगाया गया कि उन्होंने चाइल्ड लाइन टीम की हिरासत से बच्ची को जबरन छीन लिया गया। इस मामले में बुलंदशहर के काकोर पुलिस स्टेशन मे FIR दर्ज हुई। और 19 लोगों के खिलाफ टीम पर हमला करने तथा सरकारी कार्य में बाधा डालने मामला दर्ज हुआ था। उन आरोपियों ने अपने खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की थी, जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया।