जज भगवान नहीं होते : जस्टिस संजय कारोल (फ़ोटो -सौजन्य आशीष भार्गव )
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस संजय करोल अपने विदाई भाषण के दौरान बेहद भावुक नजर आए। चार दशक लंबे कानूनी सफर को याद करते हुए उन्होंने कहा कि जज कोई भगवान नहीं होते और उनसे भी गलतियां हो सकती हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि हर न्यायिक फैसला सही हो, यह संभव नहीं है।
जस्टिस करोल ने कहा कि जजों की सबसे बड़ी ताकत विनम्रता है। संविधान जजों को केवल कानून को लागू करने की जिम्मेदारी नहीं देता, बल्कि उसे न्यायपूर्ण ढंग से लागू करने की अपेक्षा भी करता है। इसी वजह से किसी मामले का फैसला करना केवल यह तय करना नहीं है कि कानूनी रूप से कौन सही है, बल्कि यह समझना भी है कि न्याय की वास्तविक जरूरत क्या है।
हम जज हैं, भगवान नहीं!
अपने संबोधन में जस्टिस करोल ने कहा कि अदालत के सामने आने वाली हर फाइल केवल तथ्य और कानूनी तर्क प्रस्तुत करती है, लेकिन वह कभी यह नहीं बता सकती कि याचिकाकर्ता ने जीवन में क्या खोया है, वह किस पीड़ा के साथ अदालत पहुंचा है और न्याय से उसकी क्या उम्मीदें हैं।
“हम जज हैं, भगवान नहीं। हमसे भी गलतियां हो सकती हैं और हमारा हर फैसला सही नहीं हो सकता।” – जस्टिस संजय करोल
जस्टिस करोल ने कहा कि न्याय केवल शब्दों, धाराओं और दलीलों का खेल नहीं है, बल्कि उन अनकहे दर्दों को सुनने की क्षमता भी है जो अक्सर अदालत की कार्यवाही में शब्दों के बीच छिपे रहते हैं।
जस्टिस करोल की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट के कई मामलों में फैसलों से ज्यादा न्यायाधीशों की मौखिक टिप्पणियों और अदालत में की गई टिप्पणियों को लेकर सार्वजनिक बहस तेज रही है। ऐसे माहौल में उनका यह संदेश न्यायिक विनम्रता और आत्मसंयम की अहमियत को रेखांकित करता है। जस्टिस करोल ने कहा कि एक जज के लिए कानून की व्याख्या जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी मानवीय संवेदना के साथ न्याय करना भी है।
जस्टिस संजय करोल ने अपने 40 वर्ष के लंबे करियर को याद करते हुए बताया कि उन्होंने अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत अधिवक्ता के रूप में की थी और पिछले 19 वर्षों तक न्यायाधीश के रूप में सेवा दी। वे हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे। इसके बाद त्रिपुरा और पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में भी उन्होंने जिम्मेदारी निभाई। 6 फरवरी 2023 को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदभार संभाला
जस्टिस संजय करोल के महत्वपूर्ण फैसले
• अगस्त 2026 में जस्टिस करोल की बेंच ने एक अहम आदेश में कहा कि विवाह जैसी प्रकृति वाले लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को पति या उसके रिश्तेदारों की क्रूरता के खिलाफ भी IPC की धारा 498A/ BNS की धारा 85 के तहत संरक्षण मिल सकता है।
• जस्टिस करोल की पीठ ने विधानसभा स्पीकर द्वारा BRS विधायकों की अयोग्यता याचिकाओं पर लंबे समय तक निर्णय न लेने को गंभीरता से लिया और समयसीमा में फैसला करने को कहा। कोर्ट ने स्पीकर की भूमिका को न्यायिक समीक्षा से परे नहीं माना।
• पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए जस्टिस करोल की पीठ ने हाईवे पर नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं और स्वच्छता उपलब्ध कराने को राज्य की जिम्मेदारी माना और Article 21 के तहत स्वच्छता के अधिकार को व्यापक जीवन के अधिकार से जोड़ा।
अपने संबोधन के अंत में जस्टिस करोल भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि अब वह देश के सबसे बड़े और सबसे प्रतिष्ठित संवैधानिक पद पर लौट रहे हैं, एक साधारण नागरिक के रूप में। जस्टिस संजय करोल को उनके फैसलों के साथ-साथ न्याय के प्रति उनकी संवेदनशीलता, विनम्रता और मानवीय दृष्टिकोण हमेशा याद किया जाएगा। ‘हम जज हैं, भगवान नहीं’ जैसे उनके शब्द न्यायिक विनम्रता की मिसाल हैं। न्याय के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान को नमन। उनके आगामी जीवन के लिए हार्दिक शुभकामनाएं। Kanoonikona जस्टिस संजय करोल के स्वस्थ, सुखी और सार्थक जीवन की कामना करता है।